1 फरवरी 2026 को पेश होने वाले आम बजट से ठीक एक दिन पहले, 31 जनवरी को संसद में पेश होगा आर्थिक सर्वेक्षण। जानिए यह 75 साल पुराना दस्तावेज क्या है, क्यों बजट से भी ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है, और कैसे यह देश की आर्थिक सेहत का पूरा चेक-अप रिपोर्ट है।

देश की आर्थिक दिशा तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक है बजट दिवस। 1 फरवरी 2026, रविवार के दिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण केंद्रीय बजट पेश करेंगी। लेकिन बजट की इस रंगीन किताब और घोषणाओं के बवंडर से ठीक एक दिन पहले, संसद के पटल पर एक और अत्यंत महत्वपूर्ण, हल्के नीले रंग का दस्तावेज रखा जाएगा – आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey)।
यह कोई साधारण रिपोर्ट नहीं, बल्कि देश की आर्थिक सेहत का पूरा मेडिकल रिकॉर्ड है। यह वह आइना है, जिसमें सरकार खुद अपने आर्थिक प्रदर्शन और देश की चुनौतियों को देखती है, और जिसके आधार पर अगले दिन का बजट तैयार किया जाता है। यह परंपरा पूरे 75 वर्ष से चली आ रही है, जो स्वतंत्र भारत के आर्थिक इतिहास का एक जीवंत दस्तावेज है।
आर्थिक सर्वेक्षण क्या है? बजट का ‘विजन डॉक्यूमेंट’
सरल शब्दों में, आर्थिक सर्वेक्षण भारत सरकार का आधिकारिक वार्षिक आर्थिक रिपोर्ट कार्ड है। इसे वित्त मंत्रालय की इकाई, भारत सरकार का आर्थिक प्रभाग तैयार करता है, जिसकी अगुवाई मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) करते हैं।
इसका उद्देश्य पिछले वित्त वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) में देश की अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करना, मौजूदा चुनौतियों की पहचान करना और आने वाले वर्ष के लिए विकास के अवसरों व दृष्टिकोण को रेखांकित करना है। यह बजट के लिए आधारभूत पृष्ठभूमि और दिशा-निर्देश तय करता है।
क्यों बजट से एक दिन पहले ही पेश किया जाता है सर्वे?
यह रोचक प्रथा 1964 में शुरू हुई। इसके पीछे तर्क स्पष्ट है:
1. संदर्भ प्रदान करना: सर्वेक्षण सांसदों, अर्थशास्त्रियों, निवेशकों और आम जनता को बजट पर चर्चा और विश्लेषण के लिए एक ठोस आर्थिक संदर्भ प्रदान करता है। बजट में किए गए प्रस्तावों को सर्वे में बताई गई आर्थिक स्थिति के संदर्भ में ही समझा जा सकता है।
2. पारदर्शिता: यह सरकार की आर्थिक मंशा और विश्लेषण को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करने का एक माध्यम है। सरकार जनता के सामने आर्थिक आंकड़े और अपना नजरिया रखती है।
3. विवेकपूर्ण चर्चा: इससे बजट पेश होने से पहले ही संसद और मीडिया में तथ्य-आधारित आर्थिक चर्चा शुरू हो जाती है।
तीन भागों में समाई होती है देश की पूरी आर्थिक तस्वीर
आर्थिक सर्वेक्षण सिर्फ आंकड़ों का पुलिंदा नहीं है। यह एक सुसंगत विश्लेषणात्मक दस्तावेज है, जो आमतौर पर दो खंडों (Volumes) में व्यवस्थित होता है, जिनके अंतर्गत तीन प्रमुख भाग होते हैं:
भाग 1: मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिति का सिंहावलोकन और भविष्य की राह
यह सर्वे का सबसे वैचारिक और विश्लेषणात्मक भाग होता है। इसमें शामिल होते हैं:
विकास दर (GDP Growth): पिछले साल का प्रदर्शन और अगले साल के लिए अनुमान। (क्या 2025-26 में विकास दर 7% को पार कर पाएगी?)
मुख्य चुनौतियाँ:महंगाई (विशेषकर खाद्य महंगाई), रोजगार, वैश्विक मंदी के जोखिम, राजकोषीय घाटे का दबाव आदि।
सुधार के सुझाव: अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए नीतिगत सिफारिशें, जैसे कृषि सुधार, निवेश बढ़ाना, निर्यात को बढ़ावा देना।
थीम आधारित अध्याय: हर साल एक विशेष थीम (जैसे ‘न्यू इंडिया’, ‘सतत विकास’, ‘जॉब्स एंड ग्रोथ’) पर गहन अध्याय होता है, जो सरकार की आर्थिक सोच को दर्शाता है।
भाग 2: सेक्टर-वार विस्तृत विश्लेषण और आंकड़े
यह भाग पूरी तरह से तथ्यों और आंकड़ों पर केंद्रित होता है। इसमें अर्थव्यवस्था के हर महत्वपूर्ण क्षेत्र का बारीकी से विश्लेषण होता है:
कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन।
मुद्रास्फीति, ब्याज दरें और वित्तीय बाजार का रुझान।
सामाजिक क्षेत्र: स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास पर खर्च और परिणाम।
बुनियादी ढाँचा (इंफ्रास्ट्रक्चर): सड़क, रेलवे, बिजली, डिजिटल इंफ्रा की प्रगति।
व्यापार: निर्यात-आयात का विवरण, व्यापार घाटा/अधिशेष।
भाग 3: भविष्य का आउटलुक और नीतिगत संकेत
यह भाग पहले दो भागों के विश्लेषण के आधार पर आगे की राह दिखाता है। यह सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं के संकेत देता है, जिन्हें अगले दिन पेश होने वाले बजट में साकार होना होता है। उदाहरण के लिए, अगर सर्वे में मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दिया गया है, तो बजट में ‘मेक इन इंडिया’ से जुड़ी घोषणाओं की उम्मीद बढ़ जाती है।
निवेशकों और आम आदमी के लिए क्यों है खास?
1. निवेशकों के लिए रोडमैप: सर्वेक्षण यह बताता है कि सरकार की नजर में कौन-से सेक्टर प्राथमिकता में हैं। अगर रिपोर्ट में ग्रीन एनर्जी, प्लास्टिक या टेक स्टार्टअप्स को ग्रोथ इंजन बताया गया है, तो निवेशक समझ जाते हैं कि इन सेक्टर्स में निवेश के अवसर आने वाले हैं। यह बाजार की दिशा तय करने में मदद करता है।
2. आम नागरिक के लिए अर्थव्यवस्था की पल्स: महंगाई कितनी रहने वाली है? नौकरियों के अवसर किन क्षेत्रों में बढ़ेंगे? क्या करियर की दिशा बदलनी चाहिए? छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए कौन-सा सेक्टर अच्छा रहेगा? इन सभी सवालों के जवाब आर्थिक सर्वेक्षण में मिलने वाले ट्रेंड और विश्लेषण में छिपे होते हैं।
3. सरकारी नीतियों का मूल्यांकन: यह दस्तावेज आपको यह आकलन करने में मदद करता है कि पिछले साल की सरकारी नीतियों और बजट घोषणाओं का जमीनी स्तर पर क्या प्रभाव पड़ा। क्या विकास दर लक्ष्य के करीब पहुंची? क्या रोजगार सृजन के लक्ष्य पूरे हुए?
75 साल का सफर: 1950-51 से 2025-26 तक
देश का पहला आर्थिक सर्वेक्षण 1950-51 के लिए पेश किया गया था, जब देश नव-स्वतंत्र था और अपनी आर्थिक नींव रख रहा था। तब से लेकर आज तक, यह दस्तावेज भारत की यात्रा – हरित क्रांति, उदारीकरण, वैश्विक महाशक्ति बनने के सफर – का मूक गवाह रहा है। यह न सिर्फ आर्थिक, बल्कि सामाजिक परिवर्तनों का इतिहास भी दर्ज करता आया है।
निष्कर्ष: बजट से पहले, सर्वेक्षण जरूर पढ़ें
31 जनवरी 2026 को जब आर्थिक सर्वेक्षण पेश होगा, तो वह सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक भविष्य का एक खाका होगा। बजट की शोर-शराबे से पहले, यह शांत और तार्किक विश्लेषण हमें यह समझने का मौका देता है कि देश वास्तव में कहाँ खड़ा है और उसे कहाँ जाना है।
अगर आप अपने निवेश, करियर या व्यवसाय को सही दिशा देना चाहते हैं, तो इस 75 साल पुरानी परंपरा से निकले इस दस्तावेज पर एक नजर जरूर डालें। यह आपको सिर्फ आज की हेडलाइन्स नहीं, बल्कि कल के अवसरों की समझ देगा
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