भारत में घर खरीदना इतना महंगा क्यों? जानें 3 मुख्य कारण – जमीन की सप्लाई पर पाबंदी, काला धन, और कमजोर किराया कानून। प्राइस-टू-इनकम रेशियो, शहर-वार डेटा, टैक्स छूट (धारा 80EEA, 24b) और PMAY सब्सिडी की पूरी जानकारी।

भारत में एक तरफ करोड़ों रुपये के लग्जरी फ्लैट बिक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एक आम मध्यम वर्गीय परिवार के लिए अच्छे लोकेशन में 2 या 3 BHK का साधारण घर खरीदना सपना ही बनकर रह गया है। आप सोच सकते हैं कि स्टील, सीमेंट और कंस्ट्रक्शन कॉस्ट बढ़ने की वजह से ऐसा हो रहा होगा, लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह मुख्य कारण नहीं है।
इस ब्लॉग पोस्ट में हम डेटा और रिसर्च के आधार पर समझेंगे कि आखिर भारत में प्रॉपर्टी इतनी अनअफोर्डेबल (अलभ्य) क्यों हो गई है। हम जानेंगे कि आखिर वो तीन मुख्य रीजन क्या हैं जिनकी वजह से आम आदमी की घर खरीदने की तमन्ना अधूरी रह जाती है।
क्या कहता है डेटा? भारत में हाउसिंग कितनी अफोर्डेबल है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि अफोर्डेबिलिटी कैसे मापी जाती है। इसके दो मुख्य पैमाने हैं:
1. प्राइस-टू-इनकम रेशियो (PTI)
इसमें 1000 स्क्वायर फीट (लगभग 90 वर्ग मीटर) के एक औसत घर की कीमत को किसी शहर की मीडियन इनकम से विभाजित किया जाता है। अगर यह अनुपात 5 से कम है, तो घर उस शहर में अफोर्डेबल माने जाते हैं।
हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस (CSEP) के एक अध्ययन में पाया गया कि भारत का यह अनुपात लगभग 11 है, जो कि वैश्विक मानक 5 से दोगुना से भी ज्यादा है ।
2. EMI-टू-इनकम रेशियो
इसमें एक घर के लिए 80% लोन (20 साल के लिए) लेने पर बनने वाली EMI को मीडियन इनकम से विभाजित किया जाता है। अगर यह अनुपात 50% से कम हो तो घर अफोर्डेबल माने जाते हैं।
मैजिकब्रिक्स की अगस्त 2024 की एक स्टडी के अनुसार, भारत का यह अनुपात बढ़कर अब 61% हो गया है, जो 2020 में 46% हुआ करता था । यह साफ दर्शाता है कि लोगों की इनकम का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ EMI में चला जा रहा है।
नाइट फ्रैंक इंडिया के हाउसिंग अफोर्डेबिलिटी इंडेक्स के मुताबिक, मुंबई सबसे महंगा शहर है, जहां यह अनुपात 50% के खतरे के निशान से ऊपर 51% है, जबकि अहमदाबाद (21%), पुणे (24%) और कोलकाता (24%) जैसे शहर सबसे अफोर्डेबल हैं ।
भारत के प्रमुख शहरों में हाउसिंग अफोर्डेबिलिटी (2024)
यहां विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार देश के प्रमुख शहरों की स्थिति का एक तुलनात्मक विवरण दिया जा रहा है:
| शहर | EMI-टू-इनकम रेशियो (नाइट फ्रैंक, H1 2024) | प्राइस-टू-इनकम रेशियो (P/I) (मैजिकब्रिक्स, 2024) | अफोर्डेबिलिटी स्तर |
|---|---|---|---|
| मुंबई (MMR) | 51% (सबसे कम अफोर्डेबल) | 14.3 (सबसे कम अफोर्डेबल) | बहुत महंगा |
| दिल्ली (NCR) | 27% | 10.1 | महंगा |
| हैदराबाद | जानकारी उपलब्ध नहीं | 61 (EMI आधारित, P/I नहीं) | महंगा |
| बेंगलुरु | 27% | 5 | मध्यम |
| चेन्नई | 25% | 5 (सबसे अफोर्डेबल में) | अफोर्डेबल |
| कोलकाता | 24% (अफोर्डेबल) | 5 (सबसे अफोर्डेबल में) | अफोर्डेबल |
| अहमदाबाद | 21% (सबसे अफोर्डेबल) | 5 (सबसे अफोर्डेबल में) | सबसे अफोर्डेबल |
| पुणे | 24% (अफोर्डेबल) | जानकारी उपलब्ध नहीं | अफोर्डेबल |
टिप्पणी: अलग-अलग एजेंसियों के गणना के तरीकों में अंतर हो सकता है। यहां विभिन्न स्रोतों से डेटा एकत्रित किया गया है।
तीन मुख्य कारण: आखिर प्रॉपर्टी इतनी महंगी क्यों है?
आम धारणा के विपरीत, सिर्फ महंगाई या कंस्ट्रक्शन मटेरियल के दाम बढ़ना इसकी वजह नहीं है। मुख्य कारण डिमांड और सप्लाई के बुनियादी नियमों में गड़बड़ी है। पिछले कुछ दशकों में, जहां महंगाई 6% सालाना की दर से बढ़ी, वहीं रियल एस्टेट की कीमतों में 9.3% CAGR की दर से उछाल आया है । इस असंतुलन के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं:
1. कारण: जमीन (लैंड) की सप्लाई पर पाबंदी (Constrained and Unpredictable Supply of Land)
रियल एस्टेट की सबसे बड़ी कच्ची सामग्री जमीन है, और इसकी सप्लाई को लेकर सबसे बड़ी समस्या है। CSEP की 2023 वाली स्टडी बताती है कि भारत के केवल 28% शहरों के पास ही एक स्वीकृत मास्टर प्लान है।
समस्या क्या है? अक्सर सरकारें एक मास्टर प्लान तो बना देती हैं, जिसमें यह अंकित होता है कि कहां सड़क बनेगी, कहां स्कूल और कहां हॉस्पिटल। लेकिन उस प्लान के साथ कोई साफ फाइनेंसिंग और टाइमलाइन अटैच नहीं होती। इसका फायदा उठाकर बिल्डर बड़ी-बड़ी जमीनें खरीद कर बैठ जाते हैं और उन्हें छोटे-छोटे हिस्सों में बाजार में रिलीज करते हैं। इस कृत्रिम कमी (Artificial Scarcity) से वे कीमतों को नियंत्रित कर सकते हैं।
सरकारी स्वीकारोक्ति: हाल ही में नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने माना कि भारत में कुल प्रोजेक्ट लागत का 50-70% हिस्सा सिर्फ जमीन की कीमत होती है, जो दूसरे देशों के मुकाबले काफी ज्यादा है । उन्होंने इस समस्या को हल करने के लिए फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) को बढ़ाकर 5-6 करने और ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट को बढ़ावा देने जैसे सुझाव दिए हैं ।
2. कारण: रियल एस्टेट में काला धन (Shadow Economy and Black Money)
शैडो इकोनॉमी का भारतीय रियल एस्टेट पर गहरा प्रभाव पड़ा है। अनटैक्स्ड कैश (ब्लैक मनी) को निवेश करने के लिए सबसे सुरक्षित और पसंदीदा जगह रियल एस्टेट ही रही है। एक अनुमान के मुताबिक भारत की GDP का लगभग 13-17% हिस्सा शैडो इकोनॉमी का रहा है, जिसका एक बड़ा हिस्सा प्रॉपर्टी में चला जाता है।
लोकल सर्किल्स के एक सर्वेक्षण में चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि 90% नागरिकों का मानना है कि रियल एस्टेट सेक्टर में काला धन अभी भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है । जब इतनी बड़ी मात्रा में नकदी किसी सेक्टर में जाती है, और दूसरी तरफ सप्लाई सीमित हो, तो कीमतों का आसमान छूना तय है। सर्वे में यह भी पाया गया कि 62% प्रॉपर्टी मालिकों ने अपनी प्रॉपर्टी को आधार कार्ड से लिंक नहीं किया था, जो पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है ।
3. कारण: ऊंची वेकेंसी और कमजोर रेंटल लॉ (High Vacancy Rate & Weak Rentals)
यह सबसे दिलचस्प और कम चर्चित कारण है। भारत में आज के समय में अनुमानित 1 करोड़ मकान खाली पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ करीब 1 करोड़ अफोर्डेबल मकानों की कमी है । यह विरोधाभास क्यों?
मुख्य वजह: भारत के किराया कानून (Rental Laws) बेहद किराएदार-समर्थक (Pro-tenant) माने जाते हैं। मकान मालिकों को डर रहता है कि कहीं किराएदार ने कब्जा कर लिया और उसे बाहर निकालना मुश्किल हो जाएगा। कमजोर कानूनी व्यवस्था और मुकदमों की लंबी खिंचती प्रक्रिया के चलते लोग अपने मकान खाली रखना पसंद करते हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1971 में जहां 53% लोग किराए के मकानों में रहते थे, वहीं 2011 में यह संख्या घटकर मात्र 28% रह गई । इसका सीधा असर यह हुआ कि लोग मजबूरन घर खरीदने के लिए बाजार में आ गए, जिससे डिमांड और बढ़ गई। हालांकि, बढ़ती डिमांड और वापस ऑफिस जाने के ट्रेंड के चलते 2024 में प्रमुख शहरों में किराये में 9-21% की उछाल देखी गई है, लेकिन अब भी स्थिति में बड़ा बदलाव नहीं आया है ।
निष्कर्ष और आगे की राह
तीनों कारणों को समझने के बाद यह साफ हो जाता है कि भारत में घरों की ऊंची कीमतों के लिए सिर्फ कंस्ट्रक्शन कॉस्ट जिम्मेदार नहीं है, बल्कि यह नीतिगत खामियों, कानूनी कमजोरियों और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं का नतीजा है।
- सबसे बड़ा झटका: नीति आयोग ने साफ किया है कि अगर जमीन की लागत को कम नहीं किया गया, तो सपना पूरा नहीं होगा। लैंड पूलिंग और FAR बढ़ाने जैसे सुझाव अहम हैं ।
- सरकारी प्रयास: सरकार ने PMAY-Urban के तहत 1 करोड़ और PMAY-G के तहत 2 करोड़ नए घरों के निर्माण का लक्ष्य रखा है। नेशनल हाउसिंग बैंक (NHB) ने अब तक 5.85 लाख घरों के लिए ₹60,000 करोड़ का रियायती रिफाइनेंस भी जारी किया है ।
- उम्मीद की किरण: RBI द्वारा ब्याज दरों को स्थिर रखे जाने और आय में हो रही बढ़ोतरी ने 2024 में अफोर्डेबिलिटी को स्थिर बनाए रखा है । साथ ही, रियल एस्टेट (Regulation and Development) एक्ट (RERA) जैसे कानूनों से धीरे-धीरे पारदर्शिता बढ़ रही है।
अगर आप घर खरीदने की सोच रहे हैं तो अहमदाबाद, कोलकाता या चेन्नई जैसे शहर आपके लिए ज्यादा किफायती साबित हो सकते हैं। लेकिन दिल्ली-एनसीआर या मुंबई में घर खरीदते समय आपको अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा इस सपने पर खर्च करने के लिए तैयार रहना होगा।
आपके शहर में घर कितने अफोर्डेबल हैं? हमें नीचे कमेंट में जरूर बताएं और ऐसे ही डेटा-बेस्ड और फाइनेंस से जुड़ी जानकारियों के लिए “टैक्स समाचार” से जुड़े रहें।
यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है और इसे निवेश या वित्तीय सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले कृपया अपने वित्तीय सलाहकार से संपर्क करें।
घर खरीदना:(Q&A )
बुनियादी सवाल (Basic Questions)
प्रश्न 1: अफोर्डेबल हाउसिंग क्या है?
उत्तर: सरकार की परिभाषा के अनुसार:
- कीमत: मेट्रो शहरों में ₹45 लाख तक, गैर-मेट्रो में ₹30 लाख तक
- आकार: 60 वर्ग मीटर (646 वर्ग फीट) तक
- आय सीमा: EWS (₹3 लाख), LIG (₹3-6 लाख), MIG (₹6-18 लाख सालाना)
प्रश्न 2: प्राइस-टू-इनकम रेशियो (PIR) आसान भाषा में समझाइए?
उत्तर: यह बताता है कि घर खरीदने के लिए कितने साल की कमाई लगानी होगी।
- फॉर्मूला: घर की कीमत ÷ सालाना आय
- अफोर्डेबल सीमा: 5 से कम
- भारत का औसत: 11 (मतलब 11 साल की कमाई बराबर)
प्रश्न 3: सबसे महंगे और सस्ते शहर कौन से हैं?
उत्तर:
- सबसे महंगा: मुंबई (EMI रेशियो 116%, PIR 40)
- महंगे: दिल्ली-NCR, हैदराबाद
- किफायती: अहमदाबाद (EMI 41%), कोलकाता (47%), चेन्नई (41%)
टैक्स और लोन (Tax & Loan)
प्रश्न 4: होम लोन पर क्या टैक्स छूट मिलती है?
| धारा | किस पर | अधिकतम छूट |
|---|---|---|
| 80C | मूलधन (Principal) | ₹1.5 लाख |
| 24(b) | ब्याज (Interest) | ₹2 लाख |
| 80EEA | अतिरिक्त ब्याज (पहली बार खरीदार, ₹45 लाख तक) | ₹1.5 लाख |
कुल संभावित छूट: ₹5 लाख सालाना (80C + 24b + 80EEA)
प्रश्न 5: अफोर्डेबल घरों पर GST कितना है?
उत्तर:
- अफोर्डेबल घर (₹45 लाख तक): 1% (बिना ITC)
- अन्य घर: 5% (बिना ITC)
- तैयार मकान (कंप्लीशन सर्टिफिकेट मिला): कोई GST नहीं
प्रश्न 6: होम लोन के लिए न्यूनतम सिबिल स्कोर?
उत्तर: 750+ (अच्छा स्कोर माना जाता है, कम ब्याज दर मिलती है)
प्रश्न 7: मौजूदा होम लोन ब्याज दरें? (फरवरी 2026)
उत्तर:
- सरकारी बैंक: 8.40% – 9.65%
- निजी बैंक: 8.55% – 9.90%
- NBFC: 8.70% – 10.25%
सरकारी योजनाएं (Government Schemes)
प्रश्न 8: PMAY में कितनी सब्सिडी मिलती है?
| श्रेणी | आय सीमा (सालाना) | सब्सिडी (ब्याज पर) |
|---|---|---|
| EWS | ₹3 लाख तक | 6.5% पर ₹2.67 लाख तक |
| LIG | ₹3-6 लाख | 6.5% पर ₹2.67 लाख तक |
| MIG-I | ₹6-12 लाख | 4% पर ₹2.35 लाख तक (समाप्त) |
| MIG-II | ₹12-18 लाख | 3% पर ₹2.30 लाख तक (समाप्त) |
नोट: MIG के लिए CLSS 31 मार्च 2021 को समाप्त, EWS/LIG जारी
प्रश्न 9: PMAY में आवेदन कैसे करें?
उत्तर:
- ऑनलाइन: pmaymis.gov.in पर जाएं → ‘Citizen Assessment’ → आधार डालें → फॉर्म भरें
- ऑफलाइन: किसी भी बैंक या हाउसिंग फाइनेंस कंपनी से संपर्क करें
प्रश्न 10: RERA ने क्या बदलाव किया?
उत्तर:
- प्रोजेक्ट रजिस्ट्रेशन अनिवार्य
- 70% पैसा एस्क्रो अकाउंट में रखना होगा
- समय पर डिलीवरी सुनिश्चित
- पारदर्शिता बढ़ी, बिल्डरों पर नियंत्रण
निवेश और भविष्य (Investment & Future)
प्रश्न 11: अफोर्डेबल या लग्जरी – कहां निवेश बेहतर?
| पहलू | अफोर्डेबल | लग्जरी |
|---|---|---|
| डिमांड | हमेशा ज्यादा | सीमित |
| जोखिम | कम | ज्यादा |
| रेंटल यील्ड | अच्छी | शुरू में कम |
| कीमत वृद्धि | स्थिर | तेज (प्राइम लोकेशन पर) |
| किसके लिए? | स्थिर आय चाहने वाले | लंबी अवधि में बड़ा रिटर्न चाहने वाले |
प्रश्न 12: आने वाले सालों में कीमतें बढ़ेंगी या घटेंगी?
उत्तर:
- बढ़ेंगी: बढ़ती डिमांड, जमीन की कमी, कंस्ट्रक्शन कॉस्ट बढ़ने से
- स्थिर रहेंगी: जिन शहरों में अनसोल्ड इन्वेंट्री ज्यादा है (जैसे NCR के कुछ हिस्से)
- विशेषज्ञ राय: धीमी लेकिन स्थिर बढ़ोतरी जारी रहेगी
महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts)
| तथ्य | आंकड़ा |
|---|---|
| भारत का औसत PIR | 11 |
| शहरों के पास स्वीकृत मास्टर प्लान | 28% |
| प्रोजेक्ट लागत में जमीन का हिस्सा | 50-70% |
| GDP में शैडो इकोनॉमी का हिस्सा | 13-17% |
| खाली मकान (वेकेंसी) | 1 करोड़ |
| अफोर्डेबल मकानों की कमी | 1 करोड़ |
| किराएदार (1971) | 53% |
| किराएदार (2011) | 28% |
तीन मुख्य कारण (एक नजर में)
| कारण | समस्या | समाधान |
|---|---|---|
| जमीन की सप्लाई | मास्टर प्लान में टाइमलाइन-फाइनेंसिंग साफ नहीं | FAR बढ़ाएं, लैंड पूलिंग |
| काला धन | अनटैक्स्ड कैश रियल एस्टेट में | RERA, GST, डिजिटल पेमेंट |
| कमजोर कानून | प्रो-टेनेंट कानून, एविक्शन मुश्किल | नया मॉडल टेनेंसी एक्ट लागू करें |
त्वरित सुझाव (Quick Tips)
✅ पहली बार घर खरीद रहे हैं? धारा 80EEA का लाभ जरूर लें (अतिरिक्त ₹1.5 लाख छूट)
✅ बजट कम है? अहमदाबाद, कोलकाता, चेन्नई जैसे किफायती शहरों पर विचार करें
✅ PMAY लाभ चाहिए? आवेदन से पहले परिवार के पास कहीं पक्का मकान न हो, यह सुनिश्चित करें
✅ ब्याज दर कम चाहिए? सिबिल स्कोर 750+ रखें, महिला के नाम से लोन लें (थोड़ी छूट मिलती है)
✅ निवेश के लिए खरीद रहे हैं? अफोर्डेबल सेगमेंट में कम जोखिम, अच्छी रेंटल यील्ड
“एक तरफ करोड़ों के फ्लैट बिक रहे, दूसरी तरफ आम आदमी 2 BHK नहीं खरीद पा रहा – यही भारतीय रियल एस्टेट की सच्चाई है।”
