क्या हैं कॉर्पोरेट बॉन्ड? कैसे खरीदें? AAA से D रेटिंग का मतलब? टैक्स और YTM का पूरा गणित। FD और म्यूचुअल फंड से तुलना।

जब भी बात होती है फिक्स इंटरेस्ट या गारंटीड रिटर्न की, तो हमारे दिमाग में एक ही नाम आता है: फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) । “भैया, एफडी करवा लो, या फिर सरकारी स्कीम में डाल दो।” लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज के समय में FD में मुश्किल से 6-7% और सरकारी योजनाओं में 7-8% का रिटर्न मिल रहा है? ऊपर से सरकारी स्कीम में पैसा लंबे समय के लिए लॉक हो जाता है।
अगर आप FD से ज्यादा रिटर्न चाहते हैं, लेकिन शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव से घबराते हैं, तो आपके लिए एक शानदार विकल्प है – कॉर्पोरेट बॉन्ड्स (Corporate Bonds) ।
आज के इस आर्टिकल में हम कॉर्पोरेट बॉन्ड्स को बिल्कुल बेसिक से लेकर एडवांस लेवल तक समझेंगे और जानेंगे कि कैसे यह आपके अगले 10 सालों की इनकम प्लानिंग को मजबूत बना सकता है।
क्या होता है कॉर्पोरेट बॉन्ड? (What is a Corporate Bond?)
अगर सीधी और सरल भाषा में कहें, तो कॉर्पोरेट बॉन्ड मतलब किसी कंपनी को दिया गया लोन।
जी हां, बिल्कुल सुनिए। जब किसी बड़ी कंपनी (जैसे Reliance, Tata, या Adani) को अपना कारोबार बढ़ाने के लिए पैसों की जरूरत होती है, तो उसके पास दो रास्ते होते हैं:
- किसी बैंक से लोन लेना।
- बॉन्ड जारी (Issue) करना।
अक्सर बड़ी और नामी कंपनियां बैंकों के चक्कर में नहीं पड़तीं। वो सीधे आप जैसे निवेशकों के पास आती हैं। वो कहती हैं, “हमें 1000 करोड़ की जरूरत है, लेकिन हम ₹10,000 वाले छोटे-छोटे बॉन्ड बेचेंगे।” आप जब यह बॉन्ड खरीदते हैं, तो आप कंपनी को लोन दे रहे होते हैं। बदले में कंपनी आपको हर साल एक तय ब्याज (कूपन रेट) देने का वादा करती है और एक तय तारीख (मैच्योरिटी) पर आपका पूरा पैसा लौटा देती है।
उदाहरण के लिए: अगर Reliance को Jio के विस्तार के लिए पैसों की जरूरत है, तो वो बैंक से 1000 करोड़ लेने की बजाय बॉन्ड इश्यू कर सकती है। आप ₹10,000 का बॉन्ड खरीद सकते हैं, आपको हर साल ब्याज मिलेगा, और 5 साल बाद आपके ₹10,000 वापस। यानी आप रिलायंस जैसी दिग्गज कंपनी को लोन दे रहे हैं।
मैच्योरिटी और एग्जिट की क्लियरिटी (Maturity & Exit Clarity)
मान लीजिए आपने 5 साल का बॉन्ड खरीदा। अगर आप 5 साल पूरे कर लेते हैं, तो कंपनी आपको आपका मूलधन (Principal) वापस कर देगी। लेकिन अगर बीच में ही पैसों की जरूरत पड़ जाए तो क्या होगा? तो घबराइए मत। चूंकि ज्यादातर अच्छे कॉर्पोरेट बॉन्ड स्टॉक एक्सचेंज (BSE/NSE) पर लिस्टेड होते हैं, आप उन्हें बेच सकते हैं। बाजार में इनकी कीमत (मार्केट प्राइस) थोड़ी कम या ज्यादा हो सकती है, लेकिन आपके पास एग्जिट का ऑप्शन हमेशा रहता है।
बॉन्ड चुनने से पहले क्या देखें? (Key Factors to Analyze)
बॉन्ड में पैसा लगाना FD की तरह आसान है, लेकिन यहां सिर्फ ब्याज दर देखकर पैसा नहीं लगाना चाहिए। यह चार बातें जरूर चेक करें:
1. क्रेडिट रेटिंग (Credit Rating) – सबसे जरूरी!
भारत में CRISIL, ICRA, CARE जैसी रेटिंग एजेंसियां हैं जो हर कंपनी की वित्तीय सेहत की जांच करके उसे रेटिंग देती हैं। यह रेटिंग बताती है कि कंपनी के डिफॉल्ट (पैसा डूबने) का रिस्क कितना है।
- AAA (ट्रिपल ए): सबसे सुरक्षित। पैसा डूबने की संभावना लगभग न के बराबर।
- AA (डबल ए): बहुत अच्छी गुणवत्ता, सुरक्षित मानी जाती है।
- A (सिंगल ए): ठीक-ठाक, लेकिन थोड़ा ध्यान देने की जरूरत है।
- BBB (ट्रिपल बी): यहां से रिस्क शुरू हो जाता है। इसे ‘इन्वेस्टमेंट ग्रेड’ की सबसे निचली सीढ़ी माना जाता है।
- BB या D: भाई साहब, यह जुआ है। इनमें पैसा लगाने का मतलब है पैसा डूबने के लिए तैयार रहना।
टैक्स समाचार की सलाह: हमेशा कम से कम ‘A’ या उससे ऊपर (AA, AAA) रेटिंग वाले बॉन्ड में ही निवेश करें। ‘AAA’ रेटिंग वाले बॉन्ड में FD से थोड़ा कम रिटर्न मिल सकता है, लेकिन ‘AA’ या ‘A’ रेटिंग वाले बॉन्ड में FD से ज्यादा रिटर्न मिलता है और रिस्क भी कंट्रोल में रहता है।
2. YTM (यील्ड टू मैच्योरिटी) को समझें
कई बार लोग सिर्फ ‘कूपन रेट’ (ब्याज दर) देखकर बॉन्ड खरीद लेते हैं, जबकि सही पैमाना YTM होता है। सिंपल भाषा में समझिए:
YTM = (सालाना ब्याज) + (मैच्योरिटी पर मिलने वाला फायदा/नुकसान)।
उदाहरण:
मान लीजिए किसी बॉन्ड का कूपन रेट 10% है, लेकिन आपने वो बॉन्ड ₹1000 के बजाय ₹950 में खरीदा।
- आपको हर साल ₹100 ब्याज (10% of 1000) मिलेगा।
- मैच्योरिटी पर कंपनी आपको ₹1000 ही लौटाएगी। यानी ₹50 का अतिरिक्त फायदा।
- इस हिसाब से आपका YTM 10% से ज्यादा होगा।
इसी तरह, अगर आपने ₹1050 में बॉन्ड खरीदा, तो मैच्योरिटी पर ₹50 का नुकसान होगा और YTM 10% से कम होगा। इसलिए हमेशा कूपन रेट नहीं, बल्कि YTM कंपेयर करें।
3. सिक्योर्ड vs अनसिक्योर्ड बॉन्ड (Secured vs Unsecured)
- सिक्योर्ड बॉन्ड: कंपनी इन बॉन्ड के बदले में अपनी कोई प्रॉपर्टी, प्लांट या मशीनरी गिरवी (Collateral) रखती है। अगर कंपनी डिफॉल्ट करती है, तो उस प्रॉपर्टी को बेचकर आपका पैसा वापस किया जाता है। इनमें रिस्क कम होता है, इसलिए रिटर्न भी थोड़ा कम होता है। (जैसे: PFC, REC, NHAI के बॉन्ड्स)
- अनसिक्योर्ड बॉन्ड: इनमें कंपनी कोई गारंटी नहीं देती। सिर्फ कंपनी की प्रतिष्ठा और भरोसे के दम पर ये बॉन्ड जारी होते हैं। रिस्क ज्यादा, इसलिए रिटर्न भी ज्यादा। (जैसे: Bajaj Finance, HDFC, L&T के कुछ बॉन्ड्स)
अगर आप सुरक्षा चाहते हैं तो सिक्योर्ड बॉन्ड चुनें। अगर थोड़ा रिस्क लेकर ज्यादा रिटर्न चाहते हैं, तो बड़ी और भरोसेमंद कंपनियों के अनसिक्योर्ड बॉन्ड चुन सकते हैं।
4. कंपनी की फाइनेंशियल हेल्थ
केवल रेटिंग के भरोसे न बैठें। कंपनी का डेट टू इक्विटी रेशियो (Debt to Equity Ratio) जरूर देखें।
- डेट: कंपनी ने कुल कितना कर्ज ले रखा है।
- इक्विटी: कंपनी के मालिकों ने खुद का कितना पैसा लगाया है।
अगर किसी कंपनी पर पहले से ही बहुत ज्यादा कर्जा है (डेट ज्यादा, इक्विटी कम), तो समझ जाइए कि वह मुश्किल में फंस सकती है। ऐसी कंपनी के बॉन्ड में पैसा लगाने से बचें। जिस कंपनी का डेट टू इक्विटी रेशियो कम हो और वो लगातार प्रॉफिट में हो, उसी के बॉन्ड खरीदें।
कॉर्पोरेट बॉन्ड किसके लिए है? (Who should invest?)
कॉर्पोरेट बॉन्ड उन सभी के लिए एक बेहतरीन विकल्प है, जो:
- रेगुलर इनकम चाहते हैं।
- रिटायर हो चुके हैं और FD से ज्यादा रिटर्न की तलाश में हैं।
- शेयर बाजार के तूफानी उतार-चढ़ाव से बचना चाहते हैं।
- अपने पोर्टफोलियो में FD और इक्विटी के बीच का संतुलन (Balanced Portfolio) बनाना चाहते हैं।
हां, ये “ईजी मनी” नहीं है। इसमें पैसा लगाने से पहले YTM, रेटिंग और डेट-इक्विटी रेशियो जरूर चेक करें।
सिंपल इंटरेस्ट को कंपाउंड कैसे बनाएं? (Power of Compounding)
बॉन्ड में मिलने वाला ब्याज आमतौर पर सिंपल इंटरेस्ट होता है। लेकिन आप इसे कंपाउंड में बदल सकते हैं।
मान लीजिए आपने ₹1 लाख 12% वार्षिक ब्याज वाले बॉन्ड में लगाए। आपको हर साल ₹12,000 ब्याज मिलेगा।
- अगर आप यह ₹12,000 खर्च कर देते हैं, तो यह सिंपल इंटरेस्ट है।
- अगर आप यह ₹12,000 फिर से किसी दूसरे बॉन्ड या डेट फंड में निवेश कर देते हैं, तो अब आपको उसपर भी ब्याज मिलेगा। यही है पावर ऑफ कंपाउंडिंग (Power of Compounding) । ब्याज पर भी ब्याज कमाना, यही अमीर बनने का सीक्रेट फॉर्मूला है।
FD vs बॉन्ड vs म्यूचुअल फंड: क्या सही है?
| फीचर | फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) | कॉर्पोरेट बॉन्ड | डेट म्यूचुअल फंड |
|---|---|---|---|
| रिटर्न | 6-7% (फिक्स) | 8-11% (फिक्स, लेकिन बाजार मूल्य बदल सकता है) | 7-9% (फिक्स नहीं, बाजार से जुड़ा) |
| रिस्क | बहुत कम | क्रेडिट रेटिंग पर निर्भर | बॉन्ड पोर्टफोलियो पर निर्भर |
| लिक्विडिटी | कम (ब्रेक करने पर चार्ज) | अच्छी (एक्सचेंज पर बेच सकते हैं) | बहुत अच्छी (एक दिन में पैसा) |
| टैक्स | आपके इनकम स्लैब के हिसाब से | आपके इनकम स्लैब के हिसाब से | इंडेक्सेशन का फायदा (3 साल बाद) |
अगर आपको तय रिटर्न चाहिए और रिस्क लेने की क्षमता थोड़ी है, तो कॉर्पोरेट बॉन्ड FD और म्यूचुअल फंड के बीच का एक बेहतरीन संतुलन हैं।
टैक्सेशन का पूरा गणित (Taxation on Corporate Bonds)
यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। Tax Samachar में हम आपको बिना टैक्स प्लानिंग के निवेश नहीं करने देंगे।
- ब्याज पर टैक्स: बॉन्ड पर मिलने वाला ब्याज आपकी कुल आय (Income from Other Sources) में जुड़ता है। उस पर आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है। अगर आप 30% टैक्स ब्रैकेट में हैं, तो 10% ब्याज पर आपको 30% टैक्स देना होगा। साथ ही, अगर ब्याज एक साल में ₹5,000 से ज्यादा है, तो कंपनी TDS (10% या उससे ज्यादा) काट सकती है, जिसे ITR भरते समय एडजस्ट कराया जा सकता है।
- बेचने पर टैक्स (कैपिटल गेन): अगर आपने बॉन्ड एक्सचेंज पर बेचा (लिस्टेड बॉन्ड) और मैच्योरिटी से पहले बेचा, तो होने वाले लाभ पर टैक्स लगेगा:
- अगर बॉन्ड 1 साल से कम रखा (Short Term): लाभ आपकी इनकम में जुड़ेगा और स्लैब के हिसाब से टैक्स देय होगा।
- अगर बॉन्ड 1 साल से ज्यादा रखा (Long Term): लाभ पर 10% की दर से टैक्स (बिना इंडेक्सेशन के) देना होता है, अगर लाभ ₹1 लाख से ज्यादा है।
निष्कर्ष: क्या आपको निवेश करना चाहिए?
अगर आप एक ऐसा निवेश ढूंढ रहे हैं जो FD से बेहतर रिटर्न दे, शेयर बाजार की तरह वोलाटाइल न हो, और नियमित आय दे, तो कॉर्पोरेट बॉन्ड आपके लिए ही बने हैं।
बस ध्यान रखें:
- हमेशा ‘A’ या उससे ऊपर की रेटिंग देखें।
- सिक्योर्ड बॉन्ड को प्राथमिकता दें।
- कूपन रेट नहीं, YTM देखकर तुलना करें।
- कंपनी का डेट टू इक्विटी रेशियो जरूर चेक करें।
- ब्याज की रकम को दोबारा निवेश करके कंपाउंडिंग का फायदा उठाएं।
नोट: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। निवेश बाजार के जोखिमों पर आधारित होता है। कृपया कोई भी निर्णय लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से संपर्क करें।
कॉर्पोरेट बॉन्ड्स पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1: कॉर्पोरेट बॉन्ड और FD में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: कॉर्पोरेट बॉन्ड और FD में कई प्रमुख अंतर हैं:
| विशेषता | फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) | कॉर्पोरेट बॉन्ड |
|---|---|---|
| जारीकर्ता | बैंक/पोस्ट ऑफिस | कंपनियां (कॉरपोरेट) |
| सुरक्षा | DICGC द्वारा ₹5 लाख तक सुरक्षित | कंपनी की क्रेडिट रेटिंग पर निर्भर |
| रिटर्न | 6-7% (निश्चित) | 8-12% (निश्चित ब्याज + बाजार मूल्य) |
| लिक्विडिटी | समय से पहले निकालने पर पेनल्टी | स्टॉक एक्सचेंज पर बेच सकते हैं |
| लॉक-इन | कोई लॉक-इन नहीं (पेनल्टी के साथ) | कोई लॉक-इन नहीं (बाजार में बेच सकते हैं) |
| टैक्स | स्लैब के अनुसार (TDS कटता है) | स्लैब के अनुसार (TDS कटता है) |
Q2: कॉर्पोरेट बॉन्ड में न्यूनतम निवेश कितना है?
उत्तर: आमतौर पर कॉर्पोरेट बॉन्ड में न्यूनतम निवेश ₹10,000 से शुरू होता है। हालांकि, कुछ बॉन्ड्स में यह ₹1,000 से भी शुरू हो सकता है। प्राइमरी मार्केट (नए इश्यू) में अक्सर एक लॉट ₹10,000 का होता है। सेकेंडरी मार्केट (एक्सचेंज) में आप एक भी बॉन्ड खरीद सकते हैं, जो ₹1,000 से ₹10,000 के बीच हो सकता है।
Q3: कॉर्पोरेट बॉन्ड कहां से खरीद सकते हैं?
उत्तर: कॉर्पोरेट बॉन्ड खरीदने के मुख्य तरीके:
- प्राइमरी मार्केट: जब कोई कंपनी नया बॉन्ड इश्यू लाती है (जैसे NHAI, PFC, REC के बॉन्ड), तो आप सीधे आवेदन कर सकते हैं।
- सेकेंडरी मार्केट: BSE या NSE पर लिस्टेड बॉन्ड्स को आप अपने ट्रेडिंग अकाउंट (जैसे Zerodha, Groww, Angel One) से खरीद सकते हैं।
- ब्रोकरेज फर्म: कुछ ब्रोकर बॉन्ड खरीदने में मदद करते हैं।
- बैंक: कुछ सरकारी बैंक भी अपने ग्राहकों को बॉन्ड उपलब्ध कराते हैं।
Q4: क्या कॉर्पोरेट बॉन्ड में पैसा डूब सकता है?
उत्तर: हां, तकनीकी रूप से पैसा डूबने का जोखिम (Default Risk) होता है। अगर कंपनी दिवालिया हो जाती है या ब्याज/मूलधन नहीं चुका पाती है, तो आपको नुकसान हो सकता है।
लेकिन इसे कैसे कम करें:
- हमेशा AAA या AA रेटिंग वाले बॉन्ड में निवेश करें।
- सरकारी कंपनियों (PSU) के बॉन्ड्स में निवेश करें।
- सिक्योर्ड बॉन्ड चुनें, जिनमें कंपनी की संपत्ति गिरवी होती है।
- कंपनी का डेट टू इक्विटी रेशियो चेक करें।
Q5: कॉर्पोरेट बॉन्ड में निवेश कब करना चाहिए?
उत्तर: कॉर्पोरेट बॉन्ड में निवेश के लिए सही समय:
- जब ब्याज दरें ऊपर जा रही हों, तब छोटी अवधि के बॉन्ड खरीदें।
- जब ब्याज दरें स्थिर हों या गिरने की उम्मीद हो, तब लंबी अवधि के बॉन्ड लॉक करें।
- FD से ज्यादा रिटर्न चाहिए, लेकिन शेयर बाजार का रिस्क नहीं लेना चाहते।
- रिटायरमेंट के बाद नियमित आय की जरूरत हो।
Q6: कॉर्पोरेट बॉन्ड्स पर मिलने वाला ब्याज कितना सुरक्षित है?
उत्तर: ब्याज का भुगतान कंपनी की वित्तीय सेहत पर निर्भर करता है। अगर कंपनी प्रॉफिट में है और उसकी रेटिंग अच्छी है (AAA/AA), तो ब्याज मिलना लगभग निश्चित है। हालांकि, यह FD की तरह 100% गारंटीड नहीं है (FD पर ₹5 लाख तक DICGC की गारंटी है)। इसलिए रेटिंग चेक करना बहुत जरूरी है।
Q7: डेबेंचर और बॉन्ड में क्या अंतर है?
उत्तर: आम बोलचाल में दोनों को एक ही समझा जाता है, लेकिन तकनीकी रूप से:
- बॉन्ड्स: आमतौर पर सरकार या बहुत बड़ी कंपनियां जारी करती हैं। ये ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं। इनके पीछे कंपनी की संपत्ति गिरवी (Secured) हो सकती है या नहीं भी।
- डेबेंचर्स: आमतौर पर कंपनियां जारी करती हैं। ये ज्यादातर अनसिक्योर्ड होते हैं, यानी इनके पीछे कोई संपत्ति गिरवी नहीं होती, सिर्फ कंपनी की प्रतिष्ठा होती है।
भारत में आम निवेशक के लिए, दोनों को अक्सर एक ही माना जाता है, लेकिन सिक्योर्ड या अनसिक्योर्ड का अंतर जरूर देखना चाहिए।
Q8: रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए कॉर्पोरेट बॉन्ड कितने सही हैं?
उत्तर: रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए कॉर्पोरेट बॉन्ड बहुत अच्छा विकल्प हो सकते हैं, खासकर सीनियर सिटीजन के लिए।
फायदे:
- नियमित आय: हर 6 महीने या सालाना ब्याज मिलता है।
- FD से बेहतर रिटर्न: 8-9% रिटर्न आसानी से मिल जाता है।
- लिक्विडिटी: अगर पैसों की जरूरत पड़े, तो बेच सकते हैं।
सावधानी: सिर्फ AAA या AA रेटिंग वाले और सिक्योर्ड बॉन्ड ही लें। पोर्टफोलियो में सिर्फ एक कंपनी का बॉन्ड न लें, अलग-अलग कंपनियों में निवेश करें (डायवर्सिफिकेशन)।
Q9: कॉर्पोरेट बॉन्ड पर TDS कैसे कटता है?
उत्तर:
- अगर ब्याज की राशि एक वित्तीय वर्ष में ₹5,000 से ज्यादा है, तो कंपनी 10% TDS काटेगी।
- अगर आपने पैन कार्ड नहीं दिया है, तो 20% TDS कटेगा।
- अगर आपकी कुल आय टैक्सेबल नहीं है (Tax Exempt), तो आप फॉर्म 15G/15H देकर TDS कटने से रोक सकते हैं।
महत्वपूर्ण: यह TDS आपके टोटल टैक्स लायबिलिटी में एडजस्ट हो जाता है जब आप ITR फाइल करते हैं।
Q10: क्या मैं SIP के जरिए कॉर्पोरेट बॉन्ड खरीद सकता हूं?
उत्तर: सीधे कॉर्पोरेट बॉन्ड में SIP की सुविधा नहीं होती, क्योंकि यह एक बार का निवेश (Lump Sum) होता है। हालांकि, आप डेट म्यूचुअल फंड्स में SIP कर सकते हैं जो कॉर्पोरेट बॉन्ड्स में निवेश करते हैं। उन्हें “कॉर्पोरेट बॉन्ड फंड्स” या “डेट फंड्स” कहा जाता है। इनमें हर महीने छोटी रकम से निवेश शुरू किया जा सकता है।
Q11: बॉन्ड की कीमतें क्यों बदलती हैं?
उत्तर: बॉन्ड की कीमतें मुख्यतः ब्याज दरों (Interest Rates) के उल्टा चलती हैं।
- अगर बाजार में ब्याज दरें गिरती हैं, तो पुराने बॉन्ड (जिन पर ज्यादा ब्याज मिलता है) की कीमत बढ़ जाती है।
- अगर बाजार में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो पुराने बॉन्ड की कीमत गिर जाती है, क्योंकि अब नए बॉन्ड में ज्यादा ब्याज मिल रहा है।
इसके अलावा, कंपनी की क्रेडिट रेटिंग बदलने पर भी कीमत प्रभावित होती है।
Q12: सबसे सुरक्षित कॉर्पोरेट बॉन्ड कौन से हैं?
उत्तर: सबसे सुरक्षित कॉर्पोरेट बॉन्ड्स में शामिल हैं:
- सरकारी कंपनियों (PSU) के बॉन्ड्स:
- PFC (पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन)
- REC (ग्रामीण विद्युतीकरण निगम)
- NHAI (नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया)
- IRFC (इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन)
- AAA रेटिंग वाले बॉन्ड्स: HDFC, L&T, आदि।
- सिक्योर्ड बॉन्ड्स: जिनमें कंपनी की संपत्ति गिरवी हो।
Q13: कॉर्पोरेट बॉन्ड में निवेश से पहले किन 3 चीजों की जांच जरूरी है?
उत्तर: सबसे जरूरी 3 चीजें:
- क्रेडिट रेटिंग: कम से कम ‘AA’ होनी चाहिए।
- YTM (यील्ड टू मैच्योरिटी): यही आपका असली रिटर्न है, सिर्फ कूपन रेट न देखें।
- सिक्योर्ड या अनसिक्योर्ड: सुरक्षा के लिए सिक्योर्ड चुनें।
Q14: क्या कॉर्पोरेट बॉन्ड पर LTCG (लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन) टैक्स का फायदा मिलता है?
उत्तर: हां, लेकिन शर्तों के साथ:
- लिस्टेड बॉन्ड को 1 साल से ज्यादा रखने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) माना जाता है।
- LTCG पर 10% की दर से टैक्स (बिना इंडेक्सेशन के) लगता है, अगर लाभ ₹1 लाख से ज्यादा है।
- ध्यान दें: बॉन्ड्स पर इंडेक्सेशन (Indexation) का फायदा डेट म्यूचुअल फंड्स की तरह नहीं मिलता। यह सिर्फ स्टॉक्स और इक्विटी फंड्स पर लागू होता है।
Q15: मैं बॉन्ड की रेटिंग कहां देख सकता हूं?
उत्तर: बॉन्ड की रेटिंग आप निम्न जगहों पर देख सकते हैं:
- कंपनी की वेबसाइट: इन्वेस्टर रिलेशन सेक्शन में।
- स्टॉक एक्सचेंज: BSE या NSE की वेबसाइट पर कंपनी के बॉन्ड पेज पर।
- ब्रोकिंग ऐप: Groww, Zerodha, Angel One जैसे प्लेटफॉर्म पर बॉन्ड के डिटेल में रेटिंग दिखती है।
- रेटिंग एजेंसियां: CRISIL, ICRA, CARE, India Ratings की वेबसाइट पर।
Q16: अगर बॉन्ड जारी करने वाली कंपनी दिवालिया हो जाए तो क्या होगा?
उत्तर: अगर कंपनी दिवालिया (Insolvency) हो जाती है:
- सिक्योर्ड बॉन्ड होल्डर्स: सबसे पहले दावा पेश कर सकते हैं। कंपनी की संपत्ति बेचकर सबसे पहले सिक्योर्ड बॉन्ड होल्डर्स को भुगतान किया जाता है।
- अनसिक्योर्ड बॉन्ड होल्डर्स: इन्हें शेयरधारकों से पहले, लेकिन सिक्योर्ड लेंडर्स के बाद भुगतान मिलता है। अक्सर अनसिक्योर्ड बॉन्ड होल्डर्स को पूरा पैसा वापस नहीं मिल पाता।
इसलिए ही सिक्योर्ड बॉन्ड्स को प्राथमिकता दी जाती ह
Q17: क्या कॉर्पोरेट बॉन्ड से शुरुआत करना आसान है?
उत्तर: बिल्कुल। आजकल डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे बहुत आसान बना दिया है।
- अपने डीमैट अकाउंट (Groww, Zerodha, etc.) में लॉग इन करें।
- “बॉन्ड्स” या “Fixed Income” सेक्शन में जाएं।
- रेटिंग के हिसाब से फिल्टर करें (AAA/AA)।
- YTM चेक करें।
- सिक्योर्ड बॉन्ड चुनें।
- खरीदें (Buy) बटन दबाएं।
हां, शुरुआत में थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन 2-3 बार के बाद आप एक्सपर्ट हो जाएंगे। FD की तरह आसान, लेकिन बेहतर रिटर्न वाला यह रास्ता जरूर आजमाएं।
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