क्या आप जानते हैं प्रॉपर्टी टैक्स क्या होता है और यह क्यों जरूरी है? जानिए कौन, कितना और कैसे देता है यह टैक्स। पढ़िए हमारी विस्तृत गाइड जिसमें कैलकुलेशन, छूट और ऑनलाइन भुगतान की पूरी जानकारी दी गई है।

प्रॉपर्टी टैक्स जैसा कि नाम से ही पता चलता है, प्रॉपर्टी पर लगने वाला टैक्स. इसे आम भाषा में हाउस टैक्स या मकान टैक्स भी कहा जाता है. यह टैक्स नगर निगम (Municipal Corporation) या नगरपालिका द्वारा अचल संपत्ति (Real Estate) जैसे जमीन, मकान, फ्लैट या दुकान आदि पर लगाया जाता है. यह टैक्स आमतौर पर साल में एक बार लिया जाता है, लेकिन कुछ नगर निकाय इसे छमाही या तिमाही किस्तों में भी वसूलते हैं .
अगर आपके पास भी कोई संपत्ति है, चाहे वो आपके रहने के लिए हो या किराए पर दी गई हो, तो आपको यह समझना बहुत जरूरी है कि यह टैक्स कैसे काम करता है। आइए जानते हैं इसकी पूरी डिटेल.
क्या होता है प्रॉपर्टी टैक्स? (What is Property Tax?)
प्रॉपर्टी टैक्स एक प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) है, जो कि संपत्ति के मालिक (Owner) द्वारा स्थानीय सरकार (नगर निगम/पालिका) को दिया जाता है । यह टैक्स सिर्फ इसलिए नहीं लिया जाता कि आपके पास संपत्ति है, बल्कि इससे मिलने वाली राशि का इस्तेमाल आपके शहर को बेहतर बनाने में किया जाता है।
इसी फंड से आपके इलाके की सड़कों की मरम्मत, नालियों की सफाई, पार्कों के रखरखाव, स्ट्रीट लाइट और सीवेज सिस्टम जैसी सार्वजनिक सुविधाओं का खर्च चलता है । दूसरे शब्दों में कहें तो, प्रॉपर्टी टैक्स वह फीस है, जो आप शहर को रहने लायक बनाए रखने के लिए चुकाते हैं।
यह टैक्स केंद्र सरकार या राज्य सरकार नहीं, बल्कि आपके शहर की नगर निगम (जैसे दिल्ली में MCD, मुंबई में BMC, बेंगलुरु में BBMP) तय करती है और वसूलती है । इसलिए इसके नियम और दरें अलग-अलग शहरों में अलग-अलग हो सकती हैं।
किन-किन लोगों को देना होता है प्रॉपर्टी टैक्स? (Who is Liable to Pay?)
प्रॉपर्टी टैक्स देने की जिम्मेदारी संपत्ति के मालिक (Owner) की होती है, न कि किराएदार (Tenant) की। भले ही संपत्ति रिहायशी हो या कमर्शियल, अगर आप उसके मालिक हैं और वह संपत्ति आपके नगर निगम क्षेत्र के अंदर आती है, तो आपको यह टैक्स देना होगा ।
किन संपत्तियों पर लगता है टैक्स?
- रिहायशी मकान: फ्लैट, मकान, जमीन (जहां निर्माण संभव हो) ।
- व्यावसायिक संपत्ति: दुकान, ऑफिस, गोदाम ।
- औद्योगिक संपत्ति: फैक्ट्रियां ।
किन्हें मिलती है छूट (Exemptions)?
हालांकि यह शहर पर निर्भर करता है, लेकिन आमतौर पर निम्नलिखित संपत्तियों को टैक्स से छूट मिलती है :
- धार्मिक स्थल (मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर)
- श्मशान और कब्रिस्तान
- सरकारी स्कूल और अस्पताल
- ऐतिहासिक धरोहर (Heritage) इमारतें
- कुछ शहरों में, अगर संपत्ति किसी खास आकार (जैसे पंजाब में 125 गज से कम) से छोटी है तो भी छूट मिल सकती है ।
प्रॉपर्टी टैक्स कितना देना होता है? (How Much Tax to Pay?)
यह सबसे कॉमन सवाल है कि आखिर कितना पैसा चुकाना होगा? प्रॉपर्टी टैक्स की रकम तय करने का कोई एक फॉर्मूला नहीं है, लेकिन नगर निगम तीन मुख्य तरीकों में से किसी एक का इस्तेमाल करते हैं :
1. कैपिटल वैल्यू सिस्टम (CVS)
इस सिस्टम में प्रॉपर्टी के बाजार मूल्य (Market Value) के एक प्रतिशत के रूप में टैक्स लगाया जाता है। यह सिस्टम मुंबई में इस्तेमाल होता है ।
2. यूनिट एरिया वैल्यू सिस्टम (UAS)
यह सबसे प्रचलित तरीका है, जो दिल्ली, बेंगलुरु, कोलकाता, हैदराबाद में इस्तेमाल होता है। इसमें प्रति वर्ग फुट/मीटर की एक दर (Unit Area Value) तय की जाती है। यह दर लोकेशन, संपत्ति के इस्तेमाल (रिहायशी/व्यावसायिक) के हिसाब से अलग होती है। फिर इस दर को कुल बने हुए क्षेत्रफल (Built-up Area) से गुणा करके टैक्स निकाला जाता है ।
3. वार्षिक किराया मूल्य प्रणाली (RVS)
इस सिस्टम में संपत्ति से संभावित वार्षिक किराया (Annual Rental Value) निकाला जाता है, भले ही वह खाली पड़ी हो। इस वैल्यू पर टैक्स लगता है। यह सिस्टम चेन्नई में इस्तेमाल होता है ।
कैलकुलेशन का फॉर्मूला (UAS सिस्टम के लिए)
आमतौर पर यह फॉर्मूला कुछ इस तरह से है:
प्रॉपर्टी टैक्स = (बेस वैल्यू × बिल्ट-अप एरिया × आयु फैक्टर × बिल्डिंग का प्रकार × उपयोग की श्रेणी) – डेप्रिसिएशन
आइए इसे समझते हैं:
- बेस वैल्यू: आपके इलाके में प्रति वर्ग फुट/मीटर की तय कीमत ।
- बिल्ट-अप एरिया: घर का कुल बना हुआ हिस्सा (दीवारों और बालकनी सहित) ।
- आयु फैक्टर: इमारत कितनी पुरानी है। नई इमारतों पर टैक्स ज्यादा, पुरानी पर कम ।
- बिल्डिंग का प्रकार: रिहायशी, व्यावसायिक या औद्योगिक। कमर्शियल पर सबसे ज्यादा टैक्स ।
- उपयोग की श्रेणी: खुद रहने के लिए, किराए पर दिया हुआ या खाली पड़ा हुआ घर ।
- डेप्रिसिएशन (मूल्यह्रास): इमारत की उम्र और हालत के आधार पर मिलने वाली छूट ।
उदाहरण:
मान लीजिए दिल्ली के किसी इलाके में बेस वैल्यू ₹100 प्रति वर्ग मीटर है, आपका फ्लैट 50 वर्ग मीटर का है, और वह 10 साल पुराना है। नगर निगम (MCD) के फॉर्मूले में यह सब डालकर टैक्स की रकम तय होगी। रिहायशी इलाकों में यह दर 7% से 12% के बीच हो सकती है ।
प्रॉपर्टी टैक्स कैसे दें? (How to Pay Property Tax?)
अब डिजिटल इंडिया के जमाने में प्रॉपर्टी टैक्स देना बहुत आसान हो गया है। आप इसे ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से भर सकते हैं ।
ऑनलाइन भुगतान की प्रक्रिया (Online Payment):
यह सबसे आसान और तेज़ तरीका है।
- वेबसाइट पर जाएं: सबसे पहले अपने शहर के नगर निगम (Municipal Corporation) की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं। (जैसे MCD, BBMP, BMC) ।
- प्रॉपर्टी टैक्स सेक्शन चुनें: होम पेज पर “प्रॉपर्टी टैक्स” या “ऑनलाइन सर्विसेज” का विकल्प चुनें ।
- जानकारी भरें: अपना प्रॉपर्टी आईडी (Property ID) या खाता संख्या (Assessment Number) डालें। यह नंबर आपके पुराने टैक्स रसीद में मिल जाएगा ।
- विवरण चेक करें: आपकी प्रॉपर्टी से जुड़ी जानकारी स्क्रीन पर दिखेगी। उसे सही करें और वित्तीय वर्ष (Financial Year) चुनें, जिसका टैक्स भरना है।
- भुगतान करें: नेट बैंकिंग, क्रेडिट/डेबिट कार्ड, UPI या डिजिटल वॉलेट से पेमेंट करें ।
- रसीद डाउनलोड करें: भुगतान हो जाने के बाद, रसीद (Receipt) डाउनलोड करके जरूर सेव कर लें। यह भविष्य में सबूत के तौर पर काम आएगी ।
ऑफलाइन भुगतान:
- आप सीधे नगर निगम के दफ्तर जाकर या उनके द्वारा अधिकृत बैंकों में जाकर कैश या डिमांड ड्राफ्ट के जरिए टैक्स जमा कर सकते हैं ।
नोट: दिल्ली MCD ने चेक से भुगतान लेना बंद कर दिया है, इसलिए ऑनलाइन या डिजिटल पेमेंट को ही प्राथमिकता दी जाती है ।
प्रॉपर्टी टैक्स न भरने या देर से भरने पर क्या होता है? (Penalties for Late Payment)
प्रॉपर्टी टैक्स एक अनिवार्य कर है। इसे समय पर न चुकाना भारी पड़ सकता है।
- ब्याज और जुर्माना: टैक्स देर से भरने पर ब्याज (Interest) और पेनल्टी चुकानी पड़ती है। यह दर अलग-अलग निगमों में अलग-अलग होती है, आमतौर पर 5% से 20% तक ।
- उदाहरण:
- बेंगलुरु (BBMP) में, अगर आप दो साल तक लगातार टैक्स नहीं भरते हैं, तो आपको बकाया राशि के बराबर (100%) जुर्माना देना पड़ सकता है ।
- दिल्ली (MCD) में, देरी पर हर महीने 1% की दर से ब्याज लगता है ।
- पटना में 1.5% का जुर्माना लगता है ।
- कानूनी कार्रवाई: लगातार टैक्स न चुकाने पर, बकाया राशि संपत्ति से जुड़ सकती है। इससे भविष्य में संपत्ति बेचने या उस पर लोन लेने में बहुत दिक्कत हो सकती है। यहां तक कि निगम संपत्ति को सीज भी कर सकता है ।
टैक्स में छूट और बचत (Rebates and Tax Savings)
सिर्फ टैक्स देना ही नहीं, बल्कि बचत के कुछ रास्ते भी हैं।
1. रिबेट (Rebates)
कई नगर निगम प्रॉपर्टी टैक्स में छूट देते हैं :
- समय पर भुगतान: अगर आप तय तारीख से पहले टैक्स चुका देते हैं, तो 5% से 10% तक की छूट मिल सकती है।
- वरिष्ठ नागरिक (Senior Citizens): कई जगह बुजुर्गों को टैक्स में रियायत दी जाती है।
- महिलाएं: कुछ राज्यों में अगर संपत्ति महिला के नाम पर है, तो टैक्स में छूट मिलती है।
- इको-फ्रेंडली भवन: ग्रीन बिल्डिंग (Green Building) सर्टिफिकेशन वाली संपत्तियों पर भी छूट मिल सकती है ।
2. आयकर में बचत (Income Tax Deductions)
यह थोड़ा अलग मामला है। प्रॉपर्टी टैक्स, जो आप नगर निगम को देते हैं, वह आयकर (Income Tax) में ‘हाउस प्रॉपर्टी’ से होने वाली आय में कटौती का काम करता है ।
- अगर आपने प्रॉपर्टी किराए पर दी है, तो आपकी किराए की आय (Gross Annual Value) में से आपने जो प्रॉपर्टी टैक्स चुकाया है, वह घटा दिया जाता है। बची हुई आय पर टैक्स लगता है ।
- इसके अलावा, सेक्शन 24 के तहत होम लोन के ब्याज पर 2 लाख रुपये तक की छूट मिलती है। लेकिन यह प्रॉपर्टी टैक्स से अलग बचत है ।
3. डेप्रिसिएशन (मूल्यह्रास) का लाभ
अगर आपने कोई संपत्ति कारोबार (Business) के लिए खरीदी है, या उसका कुछ हिस्सा बिजनेस के लिए इस्तेमाल होता है (जैसे डॉक्टर का क्लिनिक), तो आप इनकम टैक्स में ‘डेप्रिसिएशन’ का क्लेम कर सकते हैं । इसका मतलब है कि संपत्ति की उम्र के हिसाब से उसकी कीमत में होने वाली कमी को आप अपने मुनाफे से घटाकर टैक्स बचा सकते हैं।
- रिहायशी इमारत पर सालाना 5% डेप्रिसिएशन ।
- कमर्शियल इमारत पर सालाना 10% डेप्रिसिएशन ।
निष्कर्ष (Conclusion)
प्रॉपर्टी टैक्स सिर्फ एक सरकारी वसूली नहीं है, बल्कि यह हमारे शहर के विकास की नींव है। यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि इसे समय पर चुकाएं। अगर आपने अभी तक अपना प्रॉपर्टी टैक्स नहीं भरा है, तो आज ही अपने शहर की नगर निगम की वेबसाइट पर जाकर इसे ऑनलाइन भरें और पेनल्टी से बचें।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। प्रॉपर्टी टैक्स के नियम और दरें अलग-अलग शहरों और समय के साथ बदलती रहती हैं। किसी भी वित्तीय निर्णय या टैक्स भरने से पहले कृपया अपने शहर की नगर निगम की आधिकारिक वेबसाइट या किसी योग्य टैक्स सलाहकार (CA) से सलाह जरूर लें ।
