बजट 2026 के पूर्वानुमानों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था 7.3% विकास दर और 4 ट्रिलियन डॉलर GDP के मुकाम पर है। लेकिन क्या बजट 2026 निजी निवेश, विदेशी पूंजी और निर्यात संकट जैसी चुनौतियों का समाधान कर पाएगा?

भारत का वित्तीय वर्ष 2025-26, 7.3 प्रतिशत की प्रभावशाली आर्थिक विकास दर के साथ समाप्त होने जा रहा है – एक ऐसा आंकड़ा जो आगामी बजट 2026 के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के मामले में देश ने 4 ट्रिलियन डॉलर का ऐतिहासिक आंकड़ा पार कर लिया है और एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में जापान को पीछे छोड़ने की कगार पर है। यह उपलब्धि बजट 2026 के लिए नई महत्वाकांक्षाओं को परिभाषित करती है।
खुदरा महंगाई दो प्रतिशत से नीचे बनी हुई है, और आने वाले महीनों में भी यह केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य से नीचे रहने की उम्मीद है – एक ऐसी स्थिति जो बजट 2026 में राजकोषीय नीति के लिए पर्याप्त गुंजाइश प्रदान करती है। कृषि उत्पादन, जो देश की लगभग आधी आबादी का आधार है, मजबूत स्थिति में रहा है। अनाज का उत्पादन अच्छा रहा है और सरकारी गोदामों में पर्याप्त भंडार मौजूद है, जिससे ग्रामीण आय में वृद्धि देखी गई है – एक सकारात्मक संकेत जो बजट 2026 में कृषि क्षेत्र के लिए नई योजनाओं का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
पिछले साल आयकर में की गई छूट और उपभोग पर लगने वाले जीएसटी को सरल बनाए जाने से उपभोक्ता मांग में वृद्धि हुई है और खर्च करने को प्रोत्साहन मिला है। ये उपाय आगामी बजट 2026 में और अधिक कर सुधारों की उम्मीद जगाते हैं।
ऊपरी तौर पर देखने पर भारतीय अर्थव्यवस्था एक स्वस्थ और मजबूत स्थिति में प्रतीत होती है। क्या सच में भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी चिंताएं समाप्त हो गई हैं, या बजट 2026 को इन चुनौतियों का समाधान खोजना होगा?
बजट 2026 के संदर्भ में गोल्डीलॉक्स काल की वास्तविकता
भारत की केंद्रीय बैंक, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने तेज विकास और कम महंगाई के इस संयोजन को “गोल्डीलॉक्स दौर” बताया है। यह शब्द अमेरिकी अर्थशास्त्री डेविड शुलमैन द्वारा गढ़ा गया था, जो एक ऐसी आदर्श आर्थिक स्थिति का वर्णन करता है। बजट 2026 के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस आदर्श स्थिति को बनाए रखने की होगी। हालांकि, इस उज्ज्वल चित्र के पीछे कुछ चिंताजनक रुझान भी मौजूद हैं जिन पर बजट 2026 में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होगी।
बजट 2026 और निर्यात क्षेत्र: बढ़ते दबाव का समाधान
एक प्रमुख चिंता का विषय निर्यात क्षेत्र में जारी संकट है। भारत ने 2026 का प्रवेश पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा प्रस्तावित 50% टैरिफ की लंबी छाया के साथ किया है। भारत सरकार ने व्यापारिक विविधता लाने के लिए तेजी दिखाई है और हाल ही में यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) भी किया है। लेकिन बजट 2026 को निर्यात पर पड़ने वाले इस बढ़ते दबाव का समाधान खोजना होगा।
विश्लेषकों का मानना है कि FTA लंबी अवधि में मददगार साबित होंगे, लेकिन बजट 2026 को यह सुनिश्चित करना होगा कि गैर-अमेरिकी बाजारों में भारत, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा कर पाए। इसके लिए बजट 2026 में उत्पादन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं के विस्तार, निर्यात ढांचे के आधुनिकीकरण और उद्योगों के लिए विशेष प्रोत्साहनों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होगी।
बजट 2026: निजी निवेश में दीर्घकालिक ठहराव को तोड़ने की कुंजी
जहाँ व्यापार से जुड़ी बहसों पर अक्सर टैरिफ का प्रभुत्व रहता है, वहीं अर्थशास्त्री एक और लंबे समय से चली आ रही समस्या को लेकर चिंतित हैं: कमजोर निजी निवेश। जेपी मॉर्गन के जहांगीर अज़ीज ने हाल ही में ‘हाउ इंडियाज़ इकोनॉमी वर्क्स’ पॉडकास्ट में कहा कि कॉर्पोरेट निवेश 2012 से ठहरा हुआ है और सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 12% होने पर अटका पड़ा है।
बजट 2026 के लिए यह एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है। सरकार को बजट 2026 में ऐसे उपायों पर विचार करना होगा जो निजी निवेश को प्रोत्साहित करें:
1. कॉर्पोरेट कर ढांचे में और सुधार
2. पूंजीगत व्यय पर अतिरिक्त प्रोत्साहन
3. अवसंरचना निवेश के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल को मजबूती
4. उद्योगों के लिए शोध एवं विकास (R&D) पर कर लाभ
बजट 2026 और विदेशी निवेश: एक महत्वपूर्ण फोकस क्षेत्र
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रुचिर शर्मा ने हाल ही में फाइनेंशियल टाइम्स में एक लेख में चौंकाने वाला तथ्य उजागर किया। उन्होंने बताया कि जो एशियाई अर्थव्यवस्थाएं तेज और टिकाऊ विकास कर पाईं, उनके उछाल के दौर में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) उनके सकल घरेलू उत्पाद के 4% से ऊपर चला गया। वहीं, भारत में यह आँकड़ा कभी भी 1.5% से ऊपर नहीं गया, और अब तो यह महज 0.1% पर सिमट गया है।
बजट 2026 के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है। विदेशी पूंजी का यह कमजोर प्रवाह और विदेशी निवेशकों द्वारा भारत से पैसा निकालना इस बात का संकेत है कि उच्च दिखने वाली GDP विकास दर के पीछे अंदरूनी कमजोरियाँ छिपी हुई हैं। बजट 2026 को इन चुनौतियों का सामना करने के लिए:
– विदेशी निवेशकों के लिए कर प्रोत्साहन बढ़ाने
– विनियामक प्रक्रियाओं को और सरल बनाने
– विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) के ढांचे को पुनर्जीवित करने
– विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के लिए अनुकूल वातावरण बनाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
बजट 2026: सुधार के नए प्रयास और आर्थिक रणनीति
सरकार ने हाल ही में श्रम कानूनों को अपडेट करने जैसे सुधार किए हैं और दावा किया है कि इससे व्यवसाय करने का माहौल आसान होगा। बजट 2026 को इन सुधारों को और गति देने की आवश्यकता होगी। प्रमुख क्षेत्रों में शामिल होंगे:
– श्रम सुधारों का कार्यान्वयन तेज करना
– भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाओं को सरल बनाना
– डिजिटल अवसंरचना को मजबूत करना
– स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए नई पहलें
निष्कर्ष: बजट 2026 – संतुलित और साहसिक होने की आवश्यकता
निस्संदेह, भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक मंदी के बावजूद उल्लेखनीय लचीलापन दिखा रही है। मजबूत विकास दर, नियंत्रित महंगाई और स्थिर कृषि इसकी प्रमुख ताकत हैं जो बजट 2026 के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती हैं।
हालाँकि, निजी निवेश में लंबे समय से चला आ रहा ठहराव, विदेशी पूंजी का कमजोर प्रवाह, और निर्यात क्षेत्र पर बढ़ता दबाव ऐसी चुनौतियाँ हैं जिन पर बजट 2026 में गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। एक स्थिर और समावेशी विकास पथ सुनिश्चित करने के लिए, बजट 2026 का फोकस न केवल खपत को बढ़ावा देने पर, बल्कि निवेश को प्रोत्साहित करने, निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने और व्यापार करने में आसानी सुनिश्चित करने पर भी केंद्रित होना चाहिए।
बजट 2026 को एक साहसिक और दूरदर्शी दस्तावेज बनना होगा जो:
1. विनिर्माण क्षेत्र को पुनर्जीवित करे
2. नवाचार और तकनीकी विकास को प्रोत्साहित करे
3. रोजगार सृजन पर केंद्रित हो
4. कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करे
5. हरित ऊर्जा और स्थिरता को प्राथमिकता दे
वास्तविक ‘गोल्डीलॉक्स’ स्थिति तभी हासिल हो सकती है जब बजट 2026 इन सभी पहलुओं को एक साथ मजबूती से संबोधित करे और भारत को अगले विकास चरण की ओर ले जाए।

1 thought on “भारतीय अर्थव्यवस्था पर बजट 2026 की नजर: क्या ‘गोल्डीलॉक्स’ अवधि को बनाए रख पाएगा?”