प्रीमियम देना मुश्किल हो तो पॉलिसी बंद करना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। समझें सरेंडर और पेड-अप पॉलिसी में अंतर। कैसे पेड-अप विकल्प आपकी सारी बचत डूबने से बचाता है और भविष्य में भी सुरक्षा देता है? पूरी जानकारी यहां।

आर्थिक तंगी के दौर में जब हर महीने प्रीमियम का बिल डरावना लगने लगे, तो सबसे पहले दिमाग में क्या आता है? “इस पॉलिसी को बंद कर देना चाहिए।” लेकिन यह वह निर्णय है जो एक पल की घबराहट में आपकी दस-बीस साल की बचत और भविष्य की सुरक्षा दोनों को डुबो सकता है।
सच तो यह है कि जब आप प्रीमियम देना बंद करते हैं, तो आपके सामने दो रास्ते होते हैं: पॉलिसी सरेंडर करना या उसे पेड-अप बना लेना। इन दोनों में चुनाव ही तय करेगा कि आपका अब तक का निवेश बर्बाद होगा या फिर भविष्य में आपके काम आएगा। आइए, इस गहरे अंतर को विस्तार से समझते हैं।
पहला रास्ता: पॉलिसी सरेंडर – पूर्ण विराम, पूरा नुकसान
पॉलिसी सरेंडर का मतलब है आप अपनी बीमा पॉलिसी को उसकी परिपक्वता (मैच्योरिटी) से पहले ही समाप्त कर देते हैं और बदले में बीमा कंपनी से एक निश्चित राशि ले लेते हैं, जिसे सरेंडर वैल्यू कहते हैं।
सरेंडर करने पर क्या होता है?
1. तत्काल कैश मिलता है: आपको एकमुश्त रकम मिल जाती है, जिसका इस्तेमाल आप अपनी तत्काल जरूरत के लिए कर सकते हैं।
2. बीमा कवर तुरंत खत्म: सरेंडर के ठीक उसी पल से आपका और आपके परिवार का जीवन बीमा कवर समाप्त हो जाता है। भविष्य में किसी भी अनहोनी की स्थिति में आपके नॉमिनी को एक रुपया भी नहीं मिलेगा।
3. भारी वित्तीय नुकसान: यह सबसे बड़ा झटका है। आपको आपके द्वारा अदा किए गए कुल प्रीमियम का एक छोटा सा हिस्सा ही सरेंडर वैल्यू के रूप में मिल पाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कंपनी शुरुआती वर्षों का प्रीमियम एजेंट कमीशन, पॉलिसी प्रशासनिक खर्च और अन्य चार्जेज में काट लेती है। अक्सर पहले 2-3 वर्षों में सरेंडर वैल्यू नगण्य होती है।
उदाहरण: यदि आपने 3 साल तक ₹50,000 सालाना प्रीमियम दिया है (कुल ₹1,50,000), तो सरेंडर पर आपको शायद ₹40,000-60,000 ही मिलें। आपका ₹90,000 से ज्यादा का निवेश व्यर्थ चला जाएगा।
दूसरा रास्ता: पेड-अप पॉलिसी – विराम नहीं, विरामचिह्न
पेड-अप पॉलिसी वह विकल्प है जहां आप भविष्य का प्रीमियम देना बंद कर देते हैं, लेकिन पॉलिसी पूरी तरह बंद नहीं होती। यह उसी रकम पर सिमटकर चलती रहती है, जितना आपने अब तक प्रीमियम भर दिया है।
पेड-अप पॉलिसी चुनने पर क्या होता है?
1. सुरक्षा बनी रहती है: सबसे बड़ा फायदा यह है कि बीमा कवर पूरी तरह खत्म नहीं होता। हां, यह कम जरूर हो जाता है। नई ‘पेड-अप सुम अश्योर्ड’ की गणना आपके द्वारा दिए गए प्रीमियमों की संख्या और कुल देय प्रीमियमों के अनुपात में की जाती है।
2. भविष्य के लाभ सुरक्षित: पॉलिसी में यदि बोनस या गारंटीड रिटर्न जुड़े हैं, तो वे आमतौर पर सुरक्षित रहते हैं और मैच्योरिटी पर कम बीमा राशि के साथ मिलते हैं।
3. वित्तीय नुकसान कम: आपका अब तक का निवेश पूरी तरह डूबता नहीं है। पॉलिसी एक छोटे रूप में जारी रहकर भविष्य में लाभ देती रहती है।
उदाहरण: मान लीजिए आपकी 20 साल की पॉलिसी में ₹10 लाख का कवर था और आपने 5 साल प्रीमियम भरने के बाद इसे पेड-अप कर दिया। अब आपकी पेड-अप सुम अश्योर्ड होगी: (5/20) * ₹10 लाख = ₹2.5 लाख। मैच्योरिटी पर आपको यह ₹2.5 लाख (और जुड़े बोनस) मिलेंगे, और इस दौरान अगर कुछ होता है तो नॉमिनी को भी यही राशि मिलेगी।
सरेंडर बनाम पेड-अप पॉलिसी: एक नजर में समझें कौन सा विकल्प आपके लिए बेहतर
जब प्रीमियम जारी रखना मुश्किल हो जाए, तो दो मुख्य विकल्प सामने आते हैं: पॉलिसी सरेंडरऔर पेड-अप पॉलिसी बनाना। इन दोनों के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है, क्योंकि यह आपकी वित्तीय सुरक्षा और निवेश दोनों को प्रभावित करता है।
पॉलिसी सरेंडर का चुनाव करने पर, आपका बीमा कवर तत्काल और पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है। इसके बदले आपको एकमुश्त राशि (सरेंडर वैल्यू) प्राप्त होती है, जो तुरंत पैसे की जरूरत को पूरा कर सकती है। हालाँकि, इस रास्ते में वित्तीय नुकसान सबसे अधिक होता है, क्योंकि बीमा कंपनी प्रशासनिक खर्च और अन्य शुल्क काट लेती है, जिससे आपको आपके कुल प्रीमियम से काफी कम रकम मिल पाती है। सबसे बड़ी कीमत यह है कि भविष्य के सभी लाभ – चाहे वह मैच्योरिटी राशि हो या बोनस – स्थायी रूप से खत्म हो जाते हैं। यह विकल्प उन लोगों के लिए है, जिन्हें अत्यावश्यक और तात्कालिक नकदी की आवश्यकता है और भविष्य में बीमा कवरेज की कोई अपेक्षा नहीं है।
वहीं पेड-अप पॉलिसी का रास्ता चुनने पर, स्थिति बिल्कुल भिन्न होती है। यहां आपको तत्काल कोई नकदी नहीं मिलती, लेकिन सबसे बड़ा लाभ यह है कि आपका बीमा कवर पूरी तरह से खत्म नहीं होता। हां, यह कम राशि पर सिमट जरूर जाता है। वित्तीय नुकसान इस मामले में अपेक्षाकृत कम होता है, क्योंकि आपका अब तक का निवेश पूरी तरह डूबता नहीं और पॉलिसी सिकुड़े हुए रूप में जारी रहती है। भविष्य के लाभ भी बने रहते हैं – मैच्योरिटी पर आपको कम राशि और संलग्न बोनस प्राप्त होते हैं। यह विकल्प उन लोगों के लिए आदर्श है, जो आगे प्रीमियम का भुगतान जारी नहीं रख सकते, लेकिन अपने परिवार के लिए कम से कम एक आधारभूत बीमा सुरक्षा कवच बनाए रखना चाहते हैं।
सरल शब्दों में, सरेंडर एक दरवाजे को हमेशा के लिए बंद कर देता है, जबकि पेड-अप उसे आधा खुला छोड़ देता है। आपकी तात्कालिक वित्तीय मजबूरी और भविष्य की सुरक्षा आवश्यकताओं के आधार पर ही सही विकल्प का चुनाव किया जाना चाहिए।
प्रीमियम न चुका पाने की स्थिति में कोई भी निर्णय लेते समय सबसे पहले यह विश्लेषण करना आवश्यक है कि आर्थिक समस्या अस्थायी है या दीर्घकालिक। यदि समस्या कुछ महीनों के संकट या नौकरी परिवर्तन जैसी क्षणिक दुविधा है, तो पेड-अप पॉलिसी का विकल्प चुनना उचित रहता है; क्योंकि यह एक सीमित अवधि के लिए कवर जारी रखती है और भविष्य में वित्तीय स्थिति सुधरने पर निर्धारित शर्तों के तहत पॉलिसी को पुनर्जीवित भी किया जा सकता है। हालाँकि, यदि संकट दीर्घकालिक है, तो अगला प्रश्न यह विचारना होगा कि क्या तत्काल किसी बड़ी राशि की आवश्यकता है—जैसे किसी गंभीर चिकित्सा उपचार या ऋण चुकाने के लिए। ऐसी परिस्थिति में, पॉलिसी के सरेंडर पर विचार किया जा सकता है, परन्तु उससे पूर्व सही सरेंडर मूल्य जान लेना और उसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझना अत्यंत आवश्यक है। यदि तत्काल बड़ी राशि की आवश्यकता नहीं है, तो पेड-अप पॉलिसी ही बेहतर विकल्प बनी रहती है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि आप पर आश्रित व्यक्ति (जैसे जीवनसाथी, बच्चे या अन्य परिवारजन) हैं, तो किसी भी कीमत पर पेड-अप विकल्प को प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि ऐसे में आश्रितों की सुरक्षा को खतरे में डालने का कोई जोखिम नहीं लिया जाना चाहिए। इसके विपरीत, यदि आप पर कोई आश्रित नहीं है, तो दोनों विकल्पों—पेड-अप और सरेंडर—के पक्ष एवं विपक्ष को अपनी भविष्य की वित्तीय योजनाओं के साथ तौलकर ही निर्णय लेना चाहिए।
पेड-अप पॉलिसी कैसे बनवाएं? प्रक्रिया सरल है:
1. शर्तें जांचें: सबसे पहले अपने पॉलिसी दस्तावेज देखें। आमतौर पर कम से कम 3 साल का प्रीमियम भरने के बाद ही पेड-अप का विकल्प मिलता है।
2. कंपनी से संपर्क करें: अपनी बीमा कंपनी के ग्राहक सेवा या एजेंट को बताएं कि आप पॉलिसी को पेड-अप स्टेटस में ले जाना चाहते हैं।
3. फॉर्म भरें और पुष्टि लें: कंपनी का निर्धारित फॉर्म भरकर जमा करें। पुष्टि मिलने के बाद आपकी पॉलिसी पेड-अप हो जाएगी और आपको एक संशोधित पॉलिसी दस्तावेज मिलेगा।
अंतिम और सबसे जरूरी सलाह:
घबराहट में कोई जल्दबाजी का फैसला न लें। हमेशा पेड-अप विकल्प को प्राथमिकता दें, क्योंकि यह आपके अतीत के निवेश और भविष्य की सुरक्षा, दोनों को बचाता है। सरेंडर को आखिरी विकल्प के रूप में ही देखें। फैसला लेने से पहले, अपनी बीमा कंपनी से दोनों हालातों में मिलने वाली सटीक राशि का लिखित अनुमान जरूर ले लें। एक बार पॉलिसी सरेंडर हो जाने के बाद उसे वापस नहीं लाया जा सकता। आपकी थोड़ी सी सूझबूझ आपके परिवार के भविष्य की बड़ी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।
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