जानिए क्यों टीवी और फिल्म सेलिब्रिटी अब व्लॉग्स और रील्स बनाने में व्यस्त हैं। इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी कैसे काम करती है, कहाँ से आती है करोड़ों की कमाई, और भारत में इसके भविष्य पर पूरी जानकारी

आपने नोटिस किया है? आजकल बहुत सारे सेलिब्रिटी – चाहे टीवी की दुनिया के हों या फिल्मों की – अब ऑनलाइन कॉन्टेंट बनाने में जुटे हुए हैं। कहीं व्लॉग्स तो कहीं रील्स की शक्ल में, वे लगातार अपनी पर्सनल लाइफ की परतें आपके सामने खोलते जा रहे हैं। कभी सोचा है क्यों? क्या सिर्फ इसलिए कि वे ‘रेलेवेंट’ रहना चाहते हैं, आपकी नज़रों में बने रहना चाहते हैं? या इसके पीछे कोई बड़ी आर्थिक रणनीति है?
चलिए, आज पता करते हैं कि सेलिब्रिटी क्यों इन्फ्लुएंसर बनने की होड़ में शामिल हैं, जबकि इन्फ्लुएंसर खुद सेलिब्रिटी बनने का सपना देखते हैं। किसकी होती है कितनी कमाई, और यह पूरा इकोसिस्टम कैसे चलता है?
बड़ा बदलाव: ऑडियंस अब टीवी से मोबाइल पर शिफ्ट हो चुकी है
कोविड के बाद का सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि ऑडियंस बहुत ज्यादा बंट गई। लोग, खासकर युवा, अब टीवी कम देखते हैं और सिनेमा भी कम जाते हैं। उनकी पहली पसंद अब सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं, जो उनके फोन पर ही उपलब्ध हैं। ऐसे में, सेलिब्रिटी के लिए भी अपने प्रशंसकों तक सीधे पहुंचना जरूरी हो गया है – न सिर्फ रेलेवेंट रहने के लिए, बल्कि नई कमाई के रास्ते खोलने के लिए भी।
इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी का विशाल आकार: दस करोड़ क्रिएटर्स और बढ़ती संख्या
दुनिया की 8 अरब आबादी में से साढ़े 5 अरब लोगों के पास इंटरनेट और सोशल मीडिया की पहुंच है। इनमें से कम से कम 10 करोड़ लोग सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं। गोल्डमैन सैक्स ने दो साल पहले 5 करोड़ इन्फ्लुएंसर्स की बात कही थी – यानी दो साल में यह संख्या दोगुनी हो चुकी है!
भारत में अभी बहुत संभावना है। अमेरिका में हर 1000 इंस्टाग्राम यूजर्स पर 14 क्रिएटर्स हैं, जबकि भारत में सिर्फ 1.5। इसका मतलब है कि आने वाले सालों में हम हजारों नए इन्फ्लुएंसर्स देखेंगे।
कमाई के मुख्य जरिए: सिर्फ विज्ञापन ही नहीं, कई और रास्ते
1. प्लेटफॉर्म-आधारित विज्ञापन राजस्व
जब आप वीडियो देखते हैं तो उससे पहले या बीच में आने वाले विज्ञापनों से प्लेटफॉर्म क्रिएटर को एक हिस्सा देता है। इंस्टाग्राम पर रील के 1 मिलियन व्यूज पर 1 लाख रुपये तक की कमाई हो सकती है, जबकि यूट्यूब पर लंबे वीडियो से 2-3 लाख रुपये तक आसानी से कमाए जा सकते हैं।
2. प्रायोजित सामग्री (Sponsored Content):
यह भारतीय क्रिएटर्स की 90% कमाई का मुख्य जरिया है। ब्रांड क्रिएटर को पैसे देते हैं ताकि वे अपने वीडियो में 1-1.5 मिनट तक उनके प्रोडक्ट के बारे में बात करें। इसे अक्सर ‘ब्रांड कोलैबोरेशन’ कहा जाता है।
3. सहबद्ध विपणन (Affiliate Marketing):
क्रिएटर वीडियो डिस्क्रिप्शन में प्रोडक्ट लिंक डालते हैं। हर बार जब कोई उस लिंक से खरीदारी करता है, तो क्रिएटर को कमीशन मिलता है।
4. दान और सदस्यता मॉडल:
कुछ क्रिएटर्स अपने फैन्स से सीधे दान मांगते हैं या एक्सक्लूसिव कंटेंट के लिए सब्सक्रिप्शन फीस लेते हैं, हालांकि भारत में यह मॉडल अभी ज्यादा सफल नहीं है।
5. स्वयं का ब्रांड और मर्चेंडाइज:
लोकप्रिय इन्फ्लुएंसर अपना खुद का उत्पाद लाइन लॉन्च कर रहे हैं, जैसे MrBeast ने चॉकलेट और बर्गर ब्रांड शुरू किए। इवेंट में दिखने के लिए भी अच्छी-खासी फीस चार्ज की जाती है।
फॉलोअर्स के आधार पर वर्गीकरण और कमाई:
* नैनो इन्फ्लुएंसर (1k-10k फॉलोअर्स): महीने में मुश्किल से 10,000 रुपये तक।
* माइक्रो इन्फ्लुएंसर (10k-50k): बेहतर ब्रांड डील्स के साथ कमाई शुरू।
* मिड-टियर (50k-250k): स्थिर आय के साथ पेशेवर स्तर।
* मैक्रो इन्फ्लुएंसर (250k-1M): अच्छी ब्रांड डील्स और ईवेंट अपीयरेंसेस।
* मेगा इन्फ्लुएंसर / सेलिब्रिटी (1M+): लाखों-करोड़ों की कमाई। Cristiano Ronaldo एक पोस्ट के 2-2.5 मिलियन डॉलर तक लेते हैं।
भारत में अवसर और चुनौतियाँ
भारत में लगभग 25 लाख डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स हैं, जो दुनिया में अमेरिका और ब्राजील के बाद तीसरे नंबर पर है। हालांकि, इनमें से केवल 10% (लगभग 2.5 लाख) ही अच्छी कमाई कर पा रहे हैं।
सरकार भी इस इकोसिस्टम को बढ़ावा दे रही है, जैसे नेशनल क्रिएटर अवार्ड्स के माध्यम से। देश के सबसे लोकप्रिय इन्फ्लुएंसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो दुनिया के सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले नेता हैं। राजनीतिक दल भी अब पारंपरिक मीडिया के बजाय इन्फ्लुएंसर्स के जरिए युवाओं तक पहुंचने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
नियमन और भविष्य: क्या है आगे का रास्ता?
जबकि कई देश (अफगानिस्तान, उत्तर कोरिया, ऑस्ट्रेलिया) सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा रहे हैं या बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित कर रहे हैं (जैसे चीन का सख्त मॉडल), भारत में ऐसा कोई डर नहीं दिखता। यहाँ इंटरनेट और सोशल मीडिया का विस्तार जारी है।
हालांकि, जैसे-जैसे यह उद्योग बढ़ेगा, नैतिकता और विनियमन पर सवाल भी उठेंगे। क्रिएटर्स को यह तय करना होगा कि पैसा कमाने के चक्कर में वे किस तरह की सामग्री को बढ़ावा दे रहे हैं। भविष्य में कंटेंट की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और पारदर्शिता ही टिकाऊ सफलता की कुंजी होगी।
निष्कर्ष
इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी कोई नया कॉन्सेप्ट नहीं है – यह मास मीडिया के विकास की अगली कड़ी है। रेडियो के एंकर्स, फिल्म के सितारे और टीवी के होस्ट्स हमेशा से इन्फ्लुएंसर रहे हैं। इंटरनेट ने इस प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बना दिया है। अब हर किसी के पास, जिसके हाथ में स्मार्टफोन है, अपनी आवाज उठाने और एक ऑडियंस बनाने का मौका है।
यह उद्योग तेजी से बढ़ रहा है (2015 में $1 बिलियन से आज $33 बिलियन तक), लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि हर उद्योग की तरह, यहाँ भी केवल शीर्ष के कुछ प्रतिशत लोग ही बहुत बड़ी कमाई कर पाते हैं। सफलता के लिए केवल फॉलोअर्स की संख्या ही नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, रचनात्मकता और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता होगी। सेलिब्रिटी से इन्फ्लुएंसर तक का यह सफर दर्शाता है कि डिजिटल युग में, कंटेंट ही राजा है, और जो इसकी भाषा समझते हैं, वे ही सफलता की नई परिभाषा लिख रहे हैं।
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