
“2-6-10 Rule” जानिए: क्या आप अपनी सैलरी से ज्यादा महंगा फोन ले रहे हैं? इस आसान फॉर्मूले से समझें फोन की सही कीमत, EMI अवधि और मासिक बजट। कर्ज के जाल से बचने के लिए यह जरूर पढ़ें।
2-6-10 Rule: आजकल मार्केट में हर दूसरे दिन नया स्मार्टफोन लॉन्च हो रहा है। बेहतरीन कैमरा, चकाचौंध डिस्प्ले और तगड़े फीचर्स देखकर हर किसी का मन ललचा जाता है। फिर ऊपर से “नो कॉस्ट EMI” और “जीरो डाउन पेमेंट” जैसे लुभावने ऑफर्स आग में घी डालने का काम करते हैं। लेकिन इसका नतीजा क्या होता है? हम जोश में आकर वह फोन भी खरीद लेते हैं, जिसका बजट हमारे बस के बाहर होता है। क्या आपने कभी सोचा है कि ₹25,000 कमाने वाला व्यक्ति ₹1 लाख का फोन क्यों खरीद रहा है? जवाब है – खराब फाइनेंशियल प्लानिंग।
अगर आप भी नया फोन लेने की सोच रहे हैं और नहीं चाहते कि अगले कई महीनों तक आपको केवल दाल-रोटी खाकर गुजारा करना पड़े, तो निवेश और फाइनेंस की दुनिया का “2-6-10 रूल” जरूर समझ लीजिए। यह नियम आपको बताएगा कि फोन की कीमत, EMI की अवधि और मासिक किस्त आपकी सैलरी के हिसाब से कितनी होनी चाहिए, ताकि आप कर्ज और आर्थिक तनाव से बच सकें।
1. ‘2’ का नियम: फोन की कीमत की लिमिट
यह नियम आपकी ‘औकात’ यानी खर्च करने की क्षमता तय करता है।
- हमेशा फोन की कुल कीमत आपकी महीने की सैलरी के आधे (लगभग 2 हफ्ते की कमाई) से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
- उदाहरण: अगर आप महीने में ₹50,000 कमाते हैं, तो अधिकतम ₹25,000 तक का ही फोन खरीदें।
- याद रखें: फोन एक ऐसी चीज है जिसकी कीमत डिब्बे से बाहर निकलते ही 20% तक गिर जाती है। यह कोई निवेश नहीं है जो आगे चलकर बढ़ेगा। एक महीने की पूरी कमाई या दो महीने की सैलरी एक फोन पर लुटा देना फाइनेंशियली बड़ी गलती है।
2. ‘6’ का नियम: ईएमआई की मियाद (अवधि)
आजकल कंपनियां 18 महीने और 24 महीने की ईएमआई का लालच देती हैं ताकि आपको किस्त छोटी लगे। लेकिन यही ईएमआई एक खतरनाक जाल साबित हो सकती है।
- अगर फोन किस्त पर ले रहे हैं, तो EMI की अवधि 6 महीने से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
- कई बार लोग 2 साल की ईएमआई पर फोन ले लेते हैं, लेकिन 1 साल बाद ही वह पुराना लगने लगता है या खराब हो जाता है। तब आपको दुख होता है कि फोन तो चल नहीं रहा, लेकिन किस्त अभी भी भरनी पड़ रही है।
- 6 महीने में लोन खत्म करने का मतलब है कि आप जल्द ही कर्ज-मुक्त हो जाएंगे और मानसिक शांति मिलेगी।
3. ’10’ का नियम: महीने का बजट
यह नियम आपके घर के बजट को बिगड़ने से बचाता है।
- फोन की मासिक किस्त (EMI) आपकी महीने की कुल इन-हैंड सैलरी के 10% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
- उदाहरण: अगर आपकी इन-हैंड सैलरी ₹40,000 है, तो फोन की ईएमआई ₹4,000 से अधिक नहीं होनी चाहिए।
- सैलरी आते ही किराया, राशन, बिजली बिल, इंश्योरेंस जैसे कई जरूरी खर्चे सामने खड़े होते हैं। अगर फोन की ईएमआई ही ₹10,000-₹12,000 होगी, तो महीने के आखिरी दिनों में आपको दोस्तों से उधार मांगना पड़ सकता है।
फोन खरीदने से पहले खुद से पूछें ये 3 सवाल:
- क्या आपको वाकई उस ₹1 लाख के फोन के फीचर्स की जरूरत है, या आप सिर्फ पड़ोसियों और दोस्तों को दिखाने के लिए इसे ले रहे हैं?
- क्या आपको पता है कि जो फोन आज ₹50,000 में ले रहे हैं, एक साल बाद उसकी रीसेल वैल्यू ₹25,000 भी नहीं बचेगी?
- क्या आपका मौजूदा फोन वाकई काम करना बंद कर चुका है, या बस नया मॉडल आने की खुशी में आप पैसा बर्बाद कर रहे हैं?
‘2-6-10 रूल’ फॉलो करने के जबरदस्त फायदे:
- मानसिक शांति: जब आपकी ईएमआई छोटी होती है और जल्दी खत्म हो जाती है, तो आपको तनाव नहीं होता।
- बचत सुरक्षित: फोन के चक्कर में लोग अक्सर अपनी सेविंग्स खत्म कर देते हैं। यह रूल आपको ऐसा करने से रोकता है।
- क्रेडिट स्कोर सुधरेगा: जब आप छोटी अवधि (6 महीने) का लोन समय पर चुकाते हैं, तो आपका क्रेडिट स्कोर तेजी से सुधरता है।
अगर बजट कम है तो क्या करें?
अगर आपकी पसंद का फोन ‘2-6-10’ रूल में फिट नहीं बैठ रहा है, तो दो स्मार्ट रास्ते हैं:
- बचत करके खरीदें: 3-4 महीने पैसे बचाएं और जब आपके पास फोन की आधी कीमत कैश में जमा हो जाए, तब उसे खरीदें। बाकी के लिए छोटी अवधि की ईएमआई लें।
- पिछला मॉडल चुनें: नए मॉडल के आने पर पुराने मॉडल (जो कि 90% वैसे ही होते हैं) की कीमतें गिर जाती हैं। यह एक स्मार्ट खरीदार की पहचान है।
निष्कर्ष:
हमेशा याद रखें, स्मार्टफोन आपको स्मार्ट तभी बनाता है जब उसे खरीदने का तरीका भी स्मार्ट हो। ‘2-6-10’ का रूल केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह आपकी फाइनेंशियल फ्रीडम की सेफ्टी नेट है। लेकिन याद रखिए, आपके हाथ में महंगा फोन देखकर लोग आपकी तारीफ केवल 2 मिनट करेंगे, लेकिन बैंक में रखा बैलेंस और कर्ज-मुक्त जिंदगी आपको सालों तक सुकून देगी। इस साल खुद से वादा करें कि आप गैजेट्स के गुलाम नहीं, बल्कि अपने पैसों के मालिक बनेंगे।
(नोट: यह लेख सामान्य जानकारी पर आधारित है। अधिक जानकारी के लिए किसी वित्तीय सलाहकार से उचित राय लें।)
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