भारत की आयकर व्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है – नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) का आगमन। सरकार लगातार इसे और आकर्षक बना रही है, जबकि पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) धीरे-धीरे अपनी चमक खोती नज़र आ रही है। आज हम गहराई से समझेंगे कि क्या वाकई पुराना टैक्स रिजीम अब अधिकांश लोगों के लिए बेकार हो गया है, या अभी भी कोई ऐसा वर्ग है जिसके लिए यह फायदेमंद है।
सरकार का फोकस साफ: नई टैक्स व्यवस्था को बढ़ावा
पिछले कुछ बजट से एक ही तस्वीर उभर रही है – सरकार का पूरा जोर नई टैक्स व्यवस्था को अपनाने पर है। चाहे स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ाना हो या टैक्स-फ्री आय की सीमा को ऊपर उठाना, हर लाभ नए रिजीम को चुनने वालों के लिए है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि लगभग 85% टैक्सदाता पहले ही नए रिजीम में शिफ्ट हो चुके हैं, और यह संख्या 90% के पार जाने की उम्मीद है। इसके विपरीत, पुराने रिजीम में टैक्स छूट की बेसिक सीमा (₹2.5 लाख) में आखिरी बड़ा बदलाव 2014-15 में हुआ था। यह अंतर साफ दिखाता है कि भविष्य किस रिजीम का है।
नई टैक्सव्यवस्था: सरलताऔर बड़ी छूट
नए रिजीम काआकर्षण इसकी सादगीऔरबिना शर्त मिलने वाली बड़ीछूट में है।
– टैक्स-फ्रीआय की ऊंची सीमा: नए रिजीम में ₹12 लाख तक की सालानाआय पर कोई टैक्स नहीं है।
– स्टैंडर्ड डिडक्शन: इसमें ₹75,000 कास्टैंड र्डडिडक्शन भी मिलता है।
– कुल लाभ: इस तरह, कुल₹12.75 लाख तक कीआय पूर्णतःटैक्स-फ्री हो जाती है।बिना किसी निवेश या दस्तावेज के झंझट के।
पुरानी टैक्स व्यवस्था: डिडक्शन का झंझट, फिर भी सीमित लाभ
पुराने रिजीम मेंआप विभिन्नधाराओं(Sections) केतहत निवेशऔरखर्चों पर डिडक्शन लेकरअपनी टैक्सेबल इनकम कम कर सकतेहैं।लेकिन इसकी एक सीमा है।
आइए, अब विस्तार से समझतेहैं कि ₹12.75 लाख कीसालानाआय वाला एक व्यक्ति, यदि पुरानी टैक्स व्यवस्था में रहता हैऔर सभी संभव कटौतियों(डिडक्शन) काअधिकतम लाभ उठाता है, तो उसकी कर देनदारी कैसे बनतीहै।यह गणित स्पष्ट करेगा कि नई व्यवस्था के सामने पुरानी व्यवस्था कितनी पिछड़ जाती है।
कदम-दर-कदमगणना:
चरण1: कुलआयऔरअधिकतम संभव कटौतियाँ
– कुल सालानाआय: ₹12,75,000
मान लीजिए वह निम्नलिखित डिडक्शन लेता है:
1. धारा80C (PPF, LIC, बचतआदि): ₹1,50,000 (अधिकतमसीमा)
2. धारा80CCD(1B) (अतिरिक्तNPS): ₹50,000 (अधिकतमसीमा)
3. धारा 80D (मेडिकल इंश्योरेंस): ₹50,000 (स्व+ माता-पिताकेलिए)
4. धारा24(b) (घरकेलोनपरब्याज):** ₹2,00,000 (अधिकतमसीमा।*ध्यानदें: यहडिडक्शनलेनेपरआमतौरपरHRA (house rent allowance) काक्लेमनहींमिलपाता।*)
5. मानककटौती(Standard Deduction): ₹50,000
चरण2: कुल कटौतियों का योग
> ₹1,50,000 (80C) + ₹50,000 (NPS) + ₹50,000 (80D) + ₹2,00,000 (होमलोनब्याज) + ₹50,000 (मानककटौती) = ₹5,00,00
यह पुराने रिजीम में एक सामान्य सैलरीड व्यक्ति द्वारा ली जा सकने वाली अधिकतम संभव कटौतियों का एक व्यावहारिक उदाहरण है।इसमें यह माना गया है कि व्यक्ति ने पर्याप्त निवेश किया है और बड़ा हाउस लोन ले रखा है।
चरण3: कर योग्य आय(Taxable Income) की गणना
> कुलआय- कुलकटौतियाँ= करयोग्यआय
> ₹12,75,000 – ₹5,00,000 = ₹7,75,000
इसका मतलब है, तमाम निवेशऔरखर्चों के बावजूद, उसकी ₹7.75 लाख कीआय पर कर लगेगा।
चरण 4: पुराने स्लैब के अनुसार कर गणना(FY 2024-25 केअनुसार)
– ₹0 से ₹2,50,000 तक: 0% कर= ₹ 0
– ₹2,50,001 से₹5,00,000 तक: 5% कर= ₹2,50,000 का5% = ₹12,500
– ₹5,00,001 से₹10,00,000 तक: 20% कर= (₹7,75,000 – ₹5,00,000) = ₹2,75,000 का20% = ₹55,000
कर योग्य आय पर कुल कर:
> ₹0 + ₹12,500 + ₹55,000 = ₹67,500
चरण5: सेस(Cess) कीगणना
> कुलकर+ 4% स्वास्थ्यएवंशिक्षाउपकर(Health & Education Cess)
> ₹67,500 + (₹67,500 का4%) = ₹67,500 + ₹2,700 = **₹70,200**
चरण6: धारा87A कीरिबेट(छूट) कीजाँच
धारा 87A केतहत, केवल उन्हीं व्यक्तियों को₹12,500 की छूट मिलती है, जिनकी कुल कर योग्यआय₹5 लाख सेअ धिक नहीं है। हमारेउदाहरणमें, करयोग्यआय₹7.75 लाखहै, जो₹5 लाखसेअधिकहै।अतः, इस व्यक्ति को यह रिबेट नहीं मिलेगी।
चरण7: अंतिम शुद्ध करदेनदारी( Net Tax Liability)
> चूंकि रिबेट नहीं मिल रही, इसलिए अंतिम देय कर वही रहेगा जो सेस सहित निकला था।
कुल देयकर= ₹70,200
(नोट: पहले दिए गए आंकड़े में ₹82,500 कर पुराने स्लैब (बिना रिबेट वाले) के एक अलग उदाहरण के लिए था। ऊपर दी गई गणना वर्तमान स्लैब के अनुसार है और अधिक सटीक है।)*
इस विस्तृत गणना से स्पष्ट है कि पुरानी व्यवस्था में ₹12.75 लाख** की आय वाले व्यक्ति को, अधिकतम संभव निवेश और खर्चे (₹5 लाख तक) करने के बाद भी, लगभग ₹70,200 का कर चुकाना पड़ता है।
तुलनात्मक लाभ:
वहीं, यदि यही व्यक्ति नई टैक्स व्यवस्था चुनता, तो उसकी ₹12.75 लाख की पूरीआयपर कोई कर नहीं लगता (क्योंकि₹12 लाख तक कीआय पर कर शून्य है, और ₹75,000 का मानक कटौती मिलने से प्रभावी छूटसी मा₹12.75 लाख हो जाती है)।
यह भारी अंतर(₹70,200 बनाम₹0) साबित करता है कि मध्यम एवंउच्चआय वर्ग के लिए पुरानी व्यवस्था में निवेश का झंझट उठाने का अब कोई विशेष आर्थिक फायदा नहीं रह गया है।नई व्यवस्था बिना किसी शर्त के ही कहीं अधिक लाभदायक साबित हो रहीहै।
यहअंतर स्पष्ट कर देता है किमध्यम व उच्चआय वर्ग केलिए पुराना रिजीम कितना पिछड़ गया है।
तो क्या पुराना रिजीम अब बिल्कुल बेकार है?
ज्यादा तर मामलों में, हां।अगर आपकी सालानाआय ₹7-8 लाखसेअधिक है, तो नया रिजीम बिना किसी निवेश की जद्दोजहद के हीज्यादा फायदेमंदहै।
फिरभी, ये लोगअभीपुराने रिजीम में रहस कते हैं:
1. बहुत कमआय वाले: जिनकी कुल आय₹5 लाख या उससे कम है।पुराने रिजीम में धारा87A केतहत पूर्ण रिबेटमिलजाताहै।हालांकि, नए रिजीम में भीउन्हेंकोई टैक्सन हींदेना होगा।इस लिएदोनोंमेंकोई खासअंतर नहीं।
2. वे लोग जिनके पास बहुत बड़े डिडक्शन के विकल्प हैं: जैसे, बहुत बड़ा हाउस लोन ब्याज (₹2 लाख से अधिक, क्योंकि नए रिजीम में इस पर छूट नहीं), या कोई विशेष दिव्यांगता जैसी स्थिति जिसमें अतिरिक्त डिडक्शन मिलता हो। लेकिन ऐसे मामले सीमित हैं।
निष्कर्ष: भविष्य नए रिजीम काहै
सरकार की नीति और टैक्स के नए ढांचे से स्पष्ट है कि नई टैक्स व्यवस्था ही भविष्य है। यह सरल, पारदर्शी और ज्यादातर कर्मचारियों व पेशेवरों के लिए फायदेमंद है। पुरानी टैक्स व्यवस्था अब एक वैकल्पिक व्यवस्था बनकर रह गई है, जो केवल कुछ विशिष्ट परिस्थितियों वाले लोगों के लिए प्रासंगिक है।
अगर आप अभी भी पुराने रिजीम में हैं, तो इस वित्तीय वर्ष (FY 2024-25) की शुरुआत में ही एक बार अपने CA या टैक्स सलाहकार से दोनों रिजीम में टैक्स कैलकुलेशन जरूर करवा लें। संभावना बहुत अधिक है कि आपको भी नए रिजीम में शिफ्ट होने में ही फायदा नजर आएगा। टैक्स प्लानिंग का समय अभी है – सही चुनाव करें, आसानी से टैक्स बचाएं।
Read More : बैंक रिकवरी एजेंटों का उत्पीड़न? जानिए RBI ने ग्राहकों को कैसे दिए हैं विशेष अधिकार

nice information
nice infomation