बजट 2026 से पहले जानें, क्यों मिडिल क्लास की कमाई का 60% अब घर की EMI में जा रहा है। बिल्डर्स क्यों बना रहे हैं सिर्फ महंगे घर? कैसे सरकार बजट में दे सकती है EMI और अफोर्डेबल हाउसिंग को राहत? पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ें।
भारतीय अर्थव्यवस्था में एक विचित्र विरोधाभास चल रहा है। एक ओर, लक्ज़री रियल एस्टेट का बाज़ार आसमान छू रहा है, रिकॉर्ड बिक्री हो रही है। दूसरी ओर, एक साधारण, अपना छत का सपना देखने वाला मध्यवर्गीय परिवार हाउसिंग क्राइसिस के गहरे दलदल में फंसता जा रहा है। उसके लिए “अपना घर” अब एक ऐसा सपना बन गया है, जिसकी क़ीमत चुकाने में उसकी आय का अधिकांश हिस्सा खपत हो जाता है।
1 फरवरी, 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जब संसद में केंद्रीय बजट पेश करेंगी, तो करोड़ों ऐसे घर खरीदारों और आकांक्षी परिवारों की निगाहें उन पर टिकी रहेंगी, जो इस बजट से केवल आर्थिक राहत की ही नहीं, बल्कि अपने सपनों को बचाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
यह समस्या कितनी गंभीर है? एनारॉक की एक ताज़ा रिपोर्ट इस पूरे संकट को आंकड़ों में समेटती है, और चित्र बेहद चिंताजनक है।
EMI का दानव: अब कमाई का 60% हिस्सा लेने लगा है
सबसे डरावना आंकड़ा है EMI टू इनकम रेशियो(ETI) का। यह अनुपात बताता है कि किसी घर खरीदार की मासिक आय का कितना प्रतिशत हिस्सासिर्फ़ घर की किश्त (EMI) चुकाने में चला जाता है।
2020 में स्थिति: यह अनुपात लगभग 43% था। यानी औसत खरीदार अपनी कमाई का लगभग आधा हिस्सा EMI में दे रहा था, जो कि पहले से ही एक बोझिल स्थिति थी।
2025 की कठोर वास्तविकता: यह अनुपात बढ़कर 60% के ख़तरनाक स्तर पर पहुंच गया है। सीधे शब्दों में, आज एक औसत घर खरीदार अपनी मासिक आय का दो-तिहाई से भी अधिक हिस्सा सिर्फ बैंक की किश्त चुकाने में लगा देता है। इसके बाद जीवनयापन, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य ज़रूरतों के लिए बहुत कम बचता है।
मध्यवर्ग के लिए तो यह बोझ और भी विकट है। रिपोर्ट बताती है कि मिडिल-इनकम वाले परिवारों के लिए EMI का बोझ पहले 28% हुआ करता था, जो अब बढ़कर 40% हो गया है। यह उस वर्ग पर एक बड़ा आर्थिक दबाव है, जिसे देश की रीढ़ माना जाता है।
इस भयावह बोझ के पीछे के प्रमुख कारण:
- घरों की बढ़ती कीमतें: पिछले कुछ वर्षों में प्रमुख शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतों में उछाल आया है।
- होम लोन की ब्याज दरें: हालांकि रिज़र्व बank of India (RBI) ने फरवरी 2025 से दिसंबर 2025 के बीच ब्याज दरों में 1.25% (125 बेसिस पॉइंट) की कटौती की है, लेकिन COVID काल के दौरान और उससे पहले की उच्च दरों का असर अभी भी बना हुआ है। नई दरों का पूरा लाभ हर खरीदार तक नहीं पहुंच पाता।
- बिल्डर्स का रुख़ मोड़ना (सबसे बड़ा कारण): यहाँ वह मोड़ है जिसने संकट को गहरा दिया है। डेवलपर्स अब किफायती (अफोर्डेबल) घर बनाने से किनारा कर रहे हैं
बिल्डर्स ने क्यों मोड़ा सस्ते घरों से मुंह? मार्जिन का खेल
एनारॉक की रिपोर्ट इस सच्चाई को उजागर करती है कि रियल एस्टेट का बाज़ार अब दो अलग-अलग हिस्सों में बंट गया है। एनारॉक के चेयरमैन अनुज पुरी कहते हैं, “पहला हिस्सा उच्च-नेट-वर्थ व्यक्तियों (HNI) और अमीर खरीदारों का है, जो लग्ज़री प्रॉपर्टीज़ खरीद रहे हैं। दूसरा हिस्सा संघर्षरत मध्यवर्गीय घर खरीदारों का है।”
और बिल्डर पहले हिस्से की तरफ भाग रहे हैं। क्यों?
मार्जिन में ज़मीन-आसमान का अंतर: किफायती आवास परियोजनाओं में डेवलपर्स को मिलने वाला मार्जिन मात्र 10-12% रह गया है। वहीं, लग्ज़री और मिड-सेगमेंट प्रोजेक्ट्स में यह मार्जिन 25-30% या इससे भी अधिक होता है। सीधा व्यवसायिक तर्क है: कम मेहनत और कम जोखिम में ज़्यादा मुनाफ़ा।
हिस्सेदारी में भारी गिरावट: आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 2019 में, देश भर में लॉन्च किए गए कुल नए घरों में किफायती घरों की हिस्सेदारी 38% थी। 2025 आते-आते यह गिरकर मात्र 18% रह गई है। यानी, बाज़ार में सस्ते विकल्पों की आपूर्ति ही घट गई है।
इसका मतलब है कि मध्यवर्ग के सामने न केवल EMI का बोझ बढ़ा है, बल्कि उनकी बजट में खरीदने लायक घरों की संख्या भी तेज़ी से सिमट रही है। यह एक दोहरी मार है।
बजट 2026 से क्या उम्मीदें? कैसे मिल सकती है राहत?
बजट सिर्फ़ आंकड़ों का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि नीतिगत दिशा का दस्तावेज़ होता है। एनारॉक की रिपोर्ट में इस संकट से निपटने के लिए सरकार को कुछ ठोस सुझाव दिए गए हैं, जिन पर बजट में कार्रवाई की प्रबल उम्मीद है:
- “अफोर्डेबल हाउसिंग” की परिभाषा में बदलाव: वर्तमान में, अक्सर 45 लाख रुपये तक के घरों को किफायती श्रेणी में रखा जाता है। बड़े शहरों में यह राशि व्यावहारिक नहीं रह गई है। इसे बढ़ाकर 75 से 85 लाख रुपये किया जाना चाहिए। इससे इस श्रेणी में आने वाले घरों की संख्या बढ़ेगी और खरीदारों को टैक्स छूट जैसे लाभ मिल सकेंगे।
- डेवलपर्स के लिए टैक्स छूट को पुनर्जीवित करना: आयकर धारा 80-IBA के तहत पहले एक प्रावधान था, जिसमें किफायती आवास परियोजनाएं बनाने वाले डेवलपर्स को टैक्ट में छूट मिलती थी। इस तरह के प्रावधान को फिर से लागू करने से बिल्डर्स को सस्ते घर बनाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन मिलेगा।
- क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी स्कीम (CLSS) की वापसी: यह योजना मध्यवर्ग को घर खरीदने में सीधी सब्सिडी देने वाली कारगर योजना साबित हुई थी। इसे फिर से शुरू करने से खरीदारों की डाउन पेमेंट और EMI दोनों का बोझ कम होगा।
- होम लोन की सीमा में बढ़ोतरी: बैंकों को मध्यवर्ग के लिए होम लोन की सीमा बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि उनकी क्रय शक्ति बढ़े।
निष्कर्ष
मध्यवर्ग का घर का सपना EMI के बोझ और बिल्डर्स की उपेक्षा के बीच पिस रहा है। बजट 2026 सिर्फ़ वित्तीय घोषणाओं का नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संतुलन बहाल करने का एक अवसर है। अगर किफायती आवास क्षेत्र को प्रोत्साहन देने और खरीदारों के लिए EMI के बोझ को कम करने वाले ठोस कदम उठाए जाते हैं, तो न केवल लाखों परिवारों के सपने साकार होंगे, बल्कि रियल एस्टेट का यह विकास भी अधिक समावेशी और टिकाऊ बनेगा। 1 फरवरी का बजट यह तय करेगा कि मध्यवर्ग की यह दोहरी मार थमती है या और बढ़ती है।

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