स्टार्टअप फंडिंग ( startup Funding) में Equity और Royalty डील में क्या अंतर है? शार्क टैंक इंडिया की तरह डील करने से पहले जानिए फायदे, नुकसान, बिजनेस मैथ्स और हाइब्रिड मॉडल का गणित।

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भारत में स्टार्टअप कल्चर तेजी से बढ़ रहा है। हर साल हजारों युवा अपने बिजनेस आइडिया को पिच करने के लिए इन्वेस्टर्स के चक्कर लगा रहे हैं। चाहे वह कोई इनोवेटिव प्रोडक्ट हो, कोई नई सर्विस, या फिर कोई ऐप-बेस्ड स्टार्टअप – सबसे बड़ी चुनौती होती है फंडिंग।
अगर आप भी एक स्टार्टअप फाउंडर हैं और फंडिंग लेने की सोच रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए बेहद जरूरी है। जब भी कोई निवेशक (Investor) आपके स्टार्टअप में पैसा लगाता है, तो वह बदले में कुछ न कुछ जरूर मांगता है। यह ‘कुछ’ दो रूपों में हो सकता है: Equity (हिस्सेदारी) या Royalty (रॉयल्टी)।
अगर आप शार्क टैंक इंडिया (Shark Tank India) देखते हैं, तो आपने देखा होगा कि शार्क्स (निवेशक) अक्सर दोनों तरह की डील ऑफर करते हैं। कभी वे कंपनी में हिस्सेदारी (Equity) लेते हैं, तो कभी वे अपने पैसे वापस पाने के लिए रेवेन्यू शेयरिंग (Royalty) की डील करते हैं।
दिखने में ये डीलें आकर्षक लगती हैं, लेकिन इनका गणित (Business Maths) बिल्कुल अलग होता है। गलत डील चुनने से आपका कंपनी पर कंट्रोल खत्म हो सकता है या फिर आपका कैश फ्लो हमेशा के लिए कमजोर पड़ सकता है।
इस लेख में, Tax Samachar आपको Equity और Royalty डील के हर पहलू से रूबरू कराएगा, ताकि आप अपने स्टार्टअप के लिए सबसे सही फैसला ले सकें।
क्या है Equity Deal? (What is an Equity Deal?)
Equity डील का सीधा और सरल अर्थ है – आपकी कंपनी की ओनरशिप (स्वामित्व) बेचना। जब आप इक्विटी के बदले फंडिंग लेते हैं, तो आप निवेशक को अपनी कंपनी का एक हिस्सा दे देते हैं। वह निवेशक अब कंपनी का सह-मालिक (Co-owner) बन जाता है।
उदाहरण:
मान लीजिए आपने 10% इक्विटी के बदले ₹1 करोड़ का निवेश जुटाया। इसका मतलब है कि कंपनी की वैल्यू (Valuation) ₹10 करोड़ आंकी गई। अब निवेशक के पास आपकी कंपनी का 10% हिस्सा है।
Equity Deal के फायदे:
- कोई मासिक बोझ नहीं: इक्विटी डील में आपको हर महीने निवेशक को पैसे नहीं देने होते। इससे शुरुआती दौर में कैश फ्लो (Cash Flow) पर दबाव नहीं पड़ता, जो स्टार्टअप के लिए सबसे बड़ी राहत होती है।
- दीर्घकालिक साझेदारी: निवेशक सिर्फ पैसे नहीं देता, बल्कि अपना अनुभव, एक्सपर्टीज और नेटवर्क भी शेयर करता है। उसे कंपनी की ग्रोथ में रुचि होती है क्योंकि वह खुद भी मालिक है।
- जोखिम साझा करना: अगर बिजनेस फेल हो जाता है, तो निवेशक का पैसा डूब जाता है। आपको वह पैसा वापस नहीं देना है।
Equity Deal के नुकसान:
- हिस्सेदारी कम होना: हर बार फंडिंग लेने पर आपकी हिस्सेदारी (Founder’s Stake) घटती जाती है।
- कंट्रोल का नुकसान: अगर बहुत अधिक इक्विटी बांट दी गई, तो फाउंडर का कंपनी पर नियंत्रण (Control) खत्म हो सकता है। बड़े फैसले लेने के लिए निवेशकों की सहमति लेनी पड़ सकती है।
क्या है Royalty Deal? (What is a Royalty Deal?)
Royalty डील एक तरह का कर्ज (Debt) और इक्विटी का मिक्स होता है। इसे रेवेन्यू-बेस्ड फाइनेंसिंग भी कहा जाता है। इसमें आप निवेशक को कंपनी की हिस्सेदारी नहीं देते, बल्कि अपने भविष्य के राजस्व (Revenue) का एक हिस्सा देने का वादा करते हैं। यह तब तक चलता है जब तक निवेशक को उसके पैसे का एक तय गुना (जैसे 1.5x, 2x या 3x) रिटर्न नहीं मिल जाता।
उदाहरण:
मान लीजिए आप ₹50 लाख की फंडिंग 5% रॉयल्टी पर लेते हैं, जब तक कि निवेशक को 2x रिटर्न (यानी ₹1 करोड़) न मिल जाए। इसका मतलब है कि आप हर महीने अपने रेवेन्यू का 5% निवेशक को देंगे। जैसे ही कुल भुगतान ₹1 करोड़ तक पहुंच जाएगा, डील खत्म हो जाएगी और आपका निवेशक से कोई संबंध नहीं रहेगा।
Royalty Deal के फायदे:
- ओनरशिप बरकरार: इसमें आपकी कंपनी की हिस्सेदारी बिल्कुल कम नहीं होती। आप 100% मालिक बने रहते हैं।
- कंट्रोल आपके पास: निवेशक को बोर्ड में सीट नहीं मिलती और वह कंपनी के रोजमर्रा के फैसलों में दखल नहीं दे सकता।
- फंडिंग का नया तरीका: यह उन लोगों के लिए अच्छा है जो इक्विटी देना नहीं चाहते, लेकिन लोन भी नहीं ले सकते।
Royalty Deal के नुकसान:
- कैश फ्लो पर दबाव: हर महीने रेवेन्यू का एक हिस्सा निकल जाना, खासकर शुरुआती दौर में, कैश फ्लो को कमजोर कर सकता है।
- महंगा साबित हो सकता है: अगर आपका बिजनेस धीमी गति से बढ़ रहा है, तो रॉयल्टी देने में कई साल लग सकते हैं और कुल मिलाकर आप बहुत अधिक पैसे चुका सकते हैं।
- ग्रोथ पर असर: प्रॉफिट का एक हिस्सा निकल जाने से आपके पास बिजनेस को दोबारा ग्रो करने (Reinvestment) के लिए कम पैसे बचते हैं।
Business Maths से समझिए असली फर्क (Understanding the Difference with Business Maths)
सबसे बड़ा सवाल यह है कि किस डील में फाउंडर को ज्यादा फायदा होता है और किसमें निवेशक को? इसे एक उदाहरण से समझते हैं।
मान लीजिए:
- निवेश राशि: ₹50 लाख
- कंपनी की ग्रोथ: तेज (हाई-ग्रोथ स्टार्टअप)
- समय सीमा: 5 साल
- 5 साल बाद कंपनी की वैल्यू: ₹100 करोड़
केस 1: इक्विटी डील (5% इक्विटी)
अगर आपने 5% इक्विटी के बदले ₹50 लाख लिए, तो 5 साल बाद जब कंपनी ₹100 करोड़ की हो जाएगी, उस समय निवेशक के हिस्से की वैल्यू होगी:
- निवेशक की हिस्सेदारी: ₹100 करोड़ का 5% = ₹5 करोड़
परिणाम: निवेशक ने ₹50 लाख लगाए और ₹5 करोड़ (10x रिटर्न) कमाए। फाउंडर को ₹50 लाख तो मिले, लेकिन उसने ₹5 करोड़ की वैल्यू वाली हिस्सेदारी खो दी। यह फाउंडर के लिए भारी नुकसान है।
केस 2: रॉयल्टी डील (5% रॉयल्टी, 2x रिटर्न कैप के साथ)
अगर आपने 5% रॉयल्टी के बदले ₹50 लाख लिए, और डील है कि निवेशक को कुल ₹1 करोड़ (2x) वापस मिलते ही डील खत्म हो जाएगी।
- मान लीजिए आपका सालाना रेवेन्यू तेजी से बढ़ रहा है।
- आप हर महीने रेवेन्यू का 5% देते हैं।
- कुछ ही वर्षों में निवेशक को कुल ₹1 करोड़ मिल जाते हैं।
- डील खत्म। उसके बाद का सारा रेवेन्यू और प्रॉफिट सिर्फ फाउंडर का।
परिणाम: निवेशक को उसके पैसे का 2x रिटर्न मिल गया। फाउंडर ने सिर्फ ₹1 करोड़ दिए और उसकी कंपनी की वैल्यू ₹100 करोड़ है और उस पर उसका पूरा मालिकाना हक है।
निष्कर्ष: तेज ग्रोथ वाले स्टार्टअप के लिए रॉयल्टी डील इक्विटी डील के मुकाबले कहीं अधिक फायदेमंद हो सकती है।
शार्क टैंक में निवेशक Royalty क्यों ऑफर करते हैं? (Why do Sharks offer Royalty Deals?)
शार्क टैंक इंडिया में आपने देखा होगा कि अमन गुप्ता, अंकित बंसल, नमिता थापर जैसे निवेशक अक्सर “इक्विटी के साथ रॉयल्टी” या सिर्फ रॉयल्टी की डील ऑफर करते हैं। इसके पीछे मुख्य कारण हैं:
- जोखिम कम करना (Risk Mitigation): रॉयल्टी डील में निवेशक का पैसा ‘सुरक्षित’ हो जाता है। भले ही कंपनी का वैल्यूएशन न बढ़े, उसे हर महीने उसका रेवेन्यू हिस्सा मिलता रहेगा। वह अपनी मूल राशि जल्दी वापस पा लेना चाहता है।
- जल्दी रिटर्न (Quick Returns): इक्विटी डील में रिटर्न पाने के लिए निवेशक को एक्सिट (IPO या अधिग्रहण) का इंतजार करना पड़ता है, जिसमें 5-10 साल लग सकते हैं। रॉयल्टी में उसे हर महीने पैसा मिलने लगता है।
- फाउंडर की परीक्षा (Testing the Founder): रॉयल्टी डील से यह भी पता चलता है कि फाउंडर को अपने बिजनेस पर कितना भरोसा है। अगर वह हर महीने रेवेन्यू का एक हिस्सा देने को तैयार है, तो इसका मतलब है कि उसे अपने कैश फ्लो पर भरोसा है।
कब Equity Deal बेहतर होती है? (When is Equity Better?)
इक्विटी डील हर स्टार्टअप के लिए सही नहीं होती। यह उनके लिए बेहतर है:
- शुरुआती स्टेज (Idea Stage): अगर आपके पास सिर्फ एक आइडिया है और अभी प्रोडक्ट तैयार नहीं है, तो कोई भी आपको रॉयल्टी पर पैसा नहीं देगा क्योंकि रेवेन्यू है ही नहीं। ऐसे में इक्विटी ही एकमात्र विकल्प है।
- धीमी ग्रोथ वाला बिजनेस: अगर आपका बिजनेस धीमी गति से बढ़ रहा है, तो रॉयल्टी देना लंबे समय तक चल सकता है और महंगा पड़ सकता है। इक्विटी देना बेहतर होगा।
- मेंटरशिप की जरूरत: अगर आपको सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि एक अनुभवी गाइड की सख्त जरूरत है जो कंपनी चलाने में मदद करे, तो इक्विटी पार्टनर चुनें, क्योंकि रॉयल्टी पार्टनर की कंपनी चलाने में कोई दिलचस्पी नहीं होती।
कब Royalty Deal ज्यादा स्मार्ट ऑप्शन है? (When is Royalty a Smarter Option?)
रॉयल्टी डील उन स्टार्टअप्स के लिए सबसे अच्छी है जो पहले से कमा रहे हैं:
- स्टेबल रेवेन्यू (Stable Revenue): आपका प्रोडक्ट बिक रहा है, ग्राहक आ रहे हैं, और हर महीने एक तय सीमा में पैसा आ रहा है।
- हाई मार्जिन बिजनेस: जिन बिजनेस में मुनाफा (Profit Margin) अधिक होता है (जैसे सॉफ्टवेयर, सास), वे रॉयल्टी देने में सक्षम होते हैं क्योंकि उनके पास कैश फ्लो बचा रहता है।
- कंट्रोल न खोना हो: अगर आप अपनी कंपनी पर 100% नियंत्रण रखना चाहते हैं और किसी को बोर्ड में नहीं बैठाना चाहते, तो रॉयल्टी ही एकमात्र रास्ता है।
हाइब्रिड डील: इक्विटी + रॉयल्टी का खतरनाक खेल (The Hybrid Deal)
शार्क टैंक में सबसे ज्यादा जो डील होती है, वह है हाइब्रिड डील। इसमें निवेशक थोड़ी इक्विटी लेता है और साथ में रॉयल्टी भी। यह डील निवेशक के लिए सबसे फायदेमंद होती है, लेकिन फाउंडर के लिए बेहद सतर्कता की जरूरत होती है।
हाइब्रिड डील का गणित:
- निवेशक ₹1 करोड़ देता है।
- वह 5% इक्विटी लेता है + 5% रॉयल्टी तब तक जब तक उसे ₹2 करोड़ (2x) वापस न मिल जाएं।
नतीजा:
- निवेशक को रॉयल्टी से उसकी मूल राशि (₹1 करोड़) जल्दी वापस मिल जाती है और उसके बाद भी उसे 5% रॉयल्टी मिलती रहती है।
- जैसे ही 2x (₹2 करोड़) का लक्ष्य पूरा होता है, रॉयल्टी बंद हो जाती है, लेकिन उसकी 5% इक्विटी कंपनी में बनी रहती है।
- अब अगर कंपनी 5 साल में ₹100 करोड़ की हो जाती है, तो निवेशक के पास ₹5 करोड़ की इक्विटी भी होगी।
इस तरह निवेशक ने सिर्फ ₹1 करोड़ लगाकर कुल ₹2 करोड़ (रॉयल्टी) + ₹5 करोड़ (इक्विटी वैल्यू) = ₹7 करोड़ कमाए। यही कारण है कि शार्क्स हाइब्रिड डील पर जोर देते हैं।
निष्कर्ष: फाउंडर के लिए क्या सही है? (Conclusion: What is Right for the Founder?)
स्टार्टअप फंडिंग में कोई ‘एक-आकार-सभी-के-लिए’ (One-size-fits-all) फॉर्मूला नहीं है। सही चुनाव आपके बिजनेस के स्टेज, आपकी महत्वाकांक्षा और आपके व्यक्तिगत लक्ष्यों पर निर्भर करता है।
- यदि आप अगला Zomato या Unicorn बनाना चाहते हैं और आपको भरोसा है कि आपकी कंपनी की वैल्यू 10 साल में 100 गुना बढ़ेगी, तो इक्विटी देना बंद करें और रॉयल्टी पर जोर दें। शुरुआत में थोड़ा कैश फ्लो का दबाव सहना पड़ेगा, लेकिन लॉन्ग टर्म में आप अरबों की संपत्ति बचा लेंगे।
- यदि आप एक स्टेबल, लाइफस्टाइल बिजनेस चला रहे हैं और आपको मेंटरशिप की जरूरत है, तो थोड़ी इक्विटी देना कोई बड़ी बात नहीं है।
- हाइब्रिड डील से सावधान रहें। अगर निवेशक इक्विटी और रॉयल्टी दोनों मांग रहा है, तो उसके पास रखे कैलकुलेटर से अपना कैलकुलेटर मैच करें। देखें कि कहीं डील बहुत एकतरफा (One-sided) तो नहीं है।
Tax Samachar की सलाह है कि फंडिंग का कोई भी फैसला लेने से पहले किसी अच्छे CA या फाइनेंशियल एडवाइजर से जरूर मिलें। सही समय पर लिया गया सही फैसला आपके स्टार्टअप को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: क्या रॉयल्टी डील में निवेशक को प्रॉफिट का हिस्सा मिलता है या रेवेन्यू का?
रॉयल्टी डील में निवेशक को कंपनी के रेवेन्यू (कुल बिक्री) का हिस्सा मिलता है, प्रॉफिट का नहीं। भले ही कंपनी घाटे में चल रही हो, रेवेन्यू पर रॉयल्टी देनी होती है।
Q2: क्या रॉयल्टी डील में ब्याज दर लगती है?
नहीं, यह लोन नहीं है, इसलिए इसमें ब्याज दर नहीं लगती। यह रेवेन्यू शेयरिंग का एक फॉर्मूला है। रिटर्न की एक सीमा (कैप) तय होती है, जैसे 1.5x या 2x।
Q3: शार्क टैंक में हाइब्रिड डील क्या होती है?
हाइब्रिड डील में निवेशक कंपनी में थोड़ी इक्विटी (हिस्सेदारी) भी लेता है और साथ में रॉयल्टी (रेवेन्यू शेयरिंग) भी। यह निवेशक के लिए सबसे सुरक्षित और फायदेमंद डील मानी जाती है।
Q4: कौन सी डील फाउंडर के लिए ज्यादा सुरक्षित है?
अगर फाउंडर कंट्रोल नहीं खोना चाहता, तो रॉयल्टी डील सुरक्षित है। अगर फाउंडर को लगता है कि कंपनी की वैल्यू बहुत बढ़ेगी, तो रॉयल्टी देना इक्विटी देने से कहीं ज्यादा फायदेमंद है।
Q5: क्या हर स्टार्टअप रॉयल्टी डील ले सकता है?
नहीं। रॉयल्टी डील के लिए यह जरूरी है कि स्टार्टअप के पास पहले से कोई रेवेन्यू स्ट्रीम हो। अगर रेवेन्यू शून्य है, तो निवेशक रॉयल्टी डील कभी नहीं करेगा।
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