NPS के नए नियम 2026: जानिए कॉमन स्कीम और मल्टी-स्कीम फ्रेमवर्क का अंतर, सरकारी-प्राइवेट कर्मचारियों के लिए निकासी नियम, टैक्स बचत के तरीके, फायदे और नुकसान पूरी जानकारी ।

क्या आप जानते हैं कि रिटायरमेंट प्लानिंग और टैक्स बचत के सबसे भरोसेमंद विकल्प नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में हाल ही में कई अहम बदलाव हुए हैं? लेकिन इन नए बदलावों को मिलाकर एक अपडेटेड और व्यापक गाइड की कमी थी, जिसे हम आज पूरा करने जा रहे हैं।
इस लेख में हम चर्चा करेंगे:
- पुरानी एनपीएस स्कीम (जिसे अब कॉमन स्कीम कहा जाता है) और नई एनपीएस स्कीम (मल्टी-स्कीम फ्रेमवर्क) के बारे में विस्तार से।
- सरकारी और प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों पर इन बदलावों का क्या असर होगा?
- एनपीएस के क्या फायदे और नुकसान हैं?
- इस स्कीम से ज्यादा से ज्यादा फायदा कैसे उठाएं?
- नई और पुरानी टैक्स व्यवस्था में टैक्स बेनिफिट्स कैसे मिलते हैं?
साथ ही, अगर आप समग्र स्मार्ट निवेश योजना बनाना चाहते हैं, जिसमें सही चयन, आवंटन और रीबैलेंसिंग शामिल हो, तो हमारी आगामी फ्री वेबिनार में जरूर शामिल हों। नीचे दिए गए लिंक में रजिस्ट्रेशन की जानकारी दी गई है। तो चलिए, शुरू करते हैं!
एनपीएस क्या है? (What is NPS?)
NPS का मतलब नेशनल पेंशन सिस्टम है। यह भारत सरकार की पेंशन योजना है, जिसे शुरुआत में केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए लॉन्च किया गया था । इसके बाद कई राज्य सरकारों ने भी इसे अपनाया और धीरे-धीरे इसे प्राइवेट सेक्टर के लिए भी खोल दिया गया।
इसे पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) रेगुलेट करता है । NPS के दो मुख्य फायदे हैं:
- रिटायरमेंट प्लानिंग
- टैक्स बचत
खास बात यह है कि मौजूदा नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) में NPS इकलौता ऐसा निवेश है, जिसमें हमें टैक्स डिडक्शन मिलता है।
NPS में पैसा कैसे काम करता है?
जब हम NPS में पैसा लगाते हैं, तो यह पैसा बाजार में निवेश किया जाता है। इसे मुख्य रूप से तीन जगहों पर निवेश किया जाता है:
- इक्विटी (शेयर बाजार)
- कॉरपोरेट बॉन्ड्स
- सरकारी बॉन्ड्स
यह काफी हद तक म्यूचुअल फंड्स की तरह काम करता है, लेकिन म्यूचुअल फंड्स की तुलना में इसमें कुछ अतिरिक्त पाबंदियां हैं। हर सब्सक्राइबर को 12 अंकों की एक यूनिक आईडी मिलती है, जिसे पर्मानेंट रिटायरमेंट अकाउंट नंबर (PRAN) कहा जाता है । नौकरी बदलने पर भी यह प्लान नहीं बदलता है।
NPS में दो तरह के खाते होते हैं:
- टियर-1 अकाउंट: इसका मुख्य उद्देश्य रिटायरमेंट प्लानिंग है।
- टियर-2 अकाउंट: यह एक वालंटरी सेविंग अकाउंट है। इसमें निवेश करने के लिए आपके पास पहले से टियर-1 अकाउंट होना जरूरी है ।
टियर-1 बनाम टियर-2: मुख्य अंतर
| फीचर | टियर-1 अकाउंट | टियर-2 अकाउंट |
|---|---|---|
| योग्यता | 18 से 85 साल के बीच का कोई भी नागरिक | टियर-1 अकाउंट होना अनिवार्य |
| लॉक-इन | कम से कम 3 साल (पार्शियल विड्रॉल के लिए) | कोई लॉक-इन नहीं, बचत खाते की तरह काम करता है |
| न्यूनतम योगदान | सालाना कम से कम ₹1,000 | न्यूनतम ₹250 |
| टैक्स लाभ | हां, सेक्शन 80CCD के तहत | कोई टैक्स लाभ नहीं |
| निकासी | रिटायरमेंट या पार्शियल विड्रॉल के नियम लागू | कभी भी, कोई भी राशि निकाल सकते हैं |
चूंकि टियर-2 में कोई टैक्स बेनिफिट नहीं है, इसलिए यह ज्यादा लोकप्रिय नहीं है। टैक्स बचत और रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए टियर-1 अकाउंट ही मुख्य रूप से इस्तेमाल किया जाता है।
पुरानी NPS स्कीम (कॉमन स्कीम) बनाम नई मल्टी-स्कीम फ्रेमवर्क (MSF)
NPS में सबसे बड़ा बदलाव मल्टी-स्कीम फ्रेमवर्क (MSF) है। आइए पहले पुरानी व्यवस्था को समझते हैं।
पुरानी व्यवस्था (ओल्ड एनपीएस / कॉमन स्कीम):
पुरानी स्कीम में हम कुल 8 पेंशन फंड मैनेजर में से किसी एक को चुन सकते थे । फंड मैनेजर चुनने के बाद हमें दो विकल्प मिलते थे:
- एक्टिव चॉइस: इसमें निवेशक खुद अपना एसेट एलोकेशन तय कर सकता है कि कितना पैसा इक्विटी, कॉरपोरेट बॉन्ड और गवर्नमेंट सिक्योरिटीज में लगाना है। अधिकतम 75% इक्विटी में लगाने की अनुमति थी ।
- ऑटो चॉइस: इसमें एसेट एलोकेशन पेंशन फंड मैनेजर अपनी डिस्क्रिशन से करता है। यह तीन तरह के लाइफसाइकिल फंड्स में बंटा था – एग्रेसिव, मॉडरेट और कंजर्वेटिव।
नई व्यवस्था: मल्टी-स्कीम फ्रेमवर्क (MSF)
यह नई सुविधा फिलहाल सिर्फ प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए है। भविष्य में सरकारी कर्मचारियों के लिए भी इसे लागू किया जा सकता है ।
MSF में क्या खास है?
- मल्टीपल फंड मैनेजर्स और स्कीम्स: अब प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारी कई पेंशन फंड मैनेजर्स की अलग-अलग स्कीम्स में निवेश कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, 80% पैसा एचडीएफसी के इक्विटी एनपीएस फंड में और बाकी 20% आदित्य बिड़ला के गवर्नमेंट बॉन्ड एनपीएस फंड में लगाया जा सकता है।
- 100% इक्विटी का विकल्प: पुरानी स्कीम में जहां इक्विटी में अधिकतम 75% निवेश की इजाजत थी, वहीं MSF में प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारी अब 100% इक्विटी का विकल्प चुन सकते हैं । इससे म्यूचुअल फंड्स की तरह बेहतर रिटर्न की संभावना बनती है।
- निवेश के विकल्प: निवेश अब तीन मुख्य श्रेणियों में होगा:
- इक्विटी: इसमें अब गोल्ड और सिल्वर ETFs और REITs भी शामिल हैं।
- गवर्नमेंट बॉन्ड्स
- कॉरपोरेट बॉन्ड्स: इसमें अब इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) भी शामिल हैं ।
- निकासी की नई शर्त: MSF के तहत, निवेश शुरू करने के 15 साल बाद फाइनल एग्जिट (अंतिम निकासी) की जा सकती है, जबकि कॉमन स्कीम में यह सिर्फ रिटायरमेंट पर ही संभव था ।
- फीस में बदलाव: अब फंड मैनेजर्स को बेहतर रिटर्न देने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए फीस स्ट्रक्चर में बढ़ोतरी की गई है। फंड मैनेजर कुल एसेट्स का 0.3% तक फीस ले सकते हैं ।
निकासी (Withdrawal) के नियमों में बड़ा बदलाव
मल्टी-स्कीम फ्रेमवर्क के अलावा, मैच्योरिटी पर निकासी के नियमों में भी बड़ा बदलाव किया गया है ।
सरकारी क्षेत्र (Government Sector) के लिए नए नियम:
- 8 लाख रुपये से कम कॉर्पस: रिटायरमेंट पर 100% राशि एकमुश्त निकाली जा सकती है। या फिर 60% निकालकर बचे हुए 40% से एन्युइटी (पेंशन) खरीदने का विकल्प है ।
- 8 से 12 लाख रुपये का कॉर्पस: अधिकतम 6 लाख रुपये एकमुश्त निकाले जा सकते हैं। बाकी बची रकम को 6 साल के अंदर किश्तों (Systematic Lump Sum Withdrawal) में निकाला जा सकता है या फिर पूरी राशि से एन्युइटी खरीदी जा सकती है ।
- 12 लाख रुपये से अधिक कॉर्पस: अधिकतम 60% राशि एकमुश्त निकाली जा सकती है, और बाकी बचे 40% से एन्युइटी खरीदना अनिवार्य है। यहीं सबसे बड़ी कमी है, क्योंकि एन्युइटी से मिलने वाला रिटर्न आमतौर पर 5-7% के आसपास ही होता है, जबकि NPS में लॉन्ग टर्म में 10% तक रिटर्न की उम्मीद रहती है ।
प्राइवेट सेक्टर (Private Sector) के लिए नए नियम:
प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों को ज्यादा छूट दी गई है।
- 15 साल बाद या 60 साल की उम्र पर (जो पहले हो) एग्जिट किया जा सकता है ।
- 8 लाख रुपये से कम कॉर्पस: 100% एकमुश्त निकाल सकते हैं या फिर 80% निकालकर 20% से एन्युइटी खरीद सकते हैं ।
- 8 से 12 लाख रुपये का कॉर्पस: 6 लाख तक एकमुश्त निकाल सकते हैं। बाकी राशि किश्तों में निकाल सकते हैं या 80% एकमुश्त निकालकर 20% से एन्युइटी खरीद सकते हैं ।
- 12 लाख रुपये से अधिक कॉर्पस: 80% तक एकमुश्त निकाल सकते हैं और सिर्फ 20% से एन्युइटी खरीदना अनिवार्य है ।
आंशिक निकासी (Partial Withdrawal) के नियम:
अगर बीच में पैसों की जरूरत पड़े तो:
- न्यूनतम 3 साल की सदस्यता पूरी होनी चाहिए ।
- आप अपने स्वयं के योगदान (सेल्फ कंट्रीब्यूशन) का अधिकतम 25% ही निकाल सकते हैं। इसमें रिटर्न शामिल नहीं है ।
- यह पैसा सिर्फ तय उद्देश्यों के लिए ही निकाला जा सकता है:
- बच्चों की उच्च शिक्षा
- बच्चों की शादी
- खुद या परिवार की गंभीर बीमारी का इलाज
- पहला घर खरीदना या बनवाना
- स्किल डेवलपमेंट या स्टार्टअप के लिए
- 60 साल की उम्र तक अधिकतम 4 बार आंशिक निकासी की जा सकती है (पहले 3 बार थी)। निकासी के बीच न्यूनतम 5 साल का अंतर होना चाहिए ।
एनपीएस स्वास्थ्य योजना (NPS Swasthya Yojana)
PFRDA ने हाल ही में “एनपीएस स्वास्थ्य पेंशन स्कीम” नाम से एक नई पहल शुरू की है । यह फिलहाल एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू की गई है।
- उद्देश्य: यह योजना लोगों को उनकी पेंशन बचत से मेडिकल खर्चों को कवर करने में मदद करेगी।
- पात्रता: कोई भी भारतीय नागरिक इसमें शामिल हो सकता है। इसके लिए एक कॉमन स्कीम अकाउंट होना जरूरी है ।
- निकासी: सब्सक्राइबर अपने इस अकाउंट में जमा राशि में से 25% तक ओपीडी या इनपेशेंट इलाज के लिए निकाल सकते हैं। इसके लिए कोई न्यूनतम प्रतीक्षा अवधि नहीं है, लेकिन पहली निकासी से पहले कम से कम ₹50,000 जमा होने चाहिए ।
- समय पूर्व निकासी: अगर किसी गंभीर बीमारी के इलाज में एक बार में कुल कॉर्पस का 70% से ज्यादा खर्च हो जाए, तो 100% राशि एकमुश्त निकाली जा सकती है ।
एनपीएस में टैक्स के फायदे (Tax Benefits in NPS)
टैक्स के नजरिए से देखें तो एनपीएस का टियर-1 अकाउंट ईईई (EEE – Exempt, Exempt, Exempt) कैटेगरी में आता है। यानी निवेश करते समय टैक्स छूट, कमाई होने पर टैक्स छूट, और मैच्योरिटी पर निकासी पर भी टैक्स छूट।
पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) में:
- सेक्शन 80CCD(1): NPS में निवेश की गई राशि पर सेक्शन 80C के तहत ₹1.5 लाख तक की कटौती का लाभ मिलता है। यह कर्मचारियों के लिए बेसिक+डीए के 10% और सेल्फ-एम्प्लॉयड के लिए सकल आय के 20% तक सीमित है ।
- सेक्शन 80CCD(1B): इसके अलावा, अतिरिक्त ₹50,000 की कटौती का लाभ भी मिलता है। यह 1 अप्रैल 2026 से माता-पिता या अभिभावक द्वारा नाबालिग के NPS खाते में किए गए योगदान पर भी लागू होगा ।
- सेक्शन 80CCD(2): अगर आपका एम्प्लॉयर (कंपनी) आपके NPS में योगदान करती है, तो उस पर भी टैक्स छूट मिलती है। यह राशि आपके बेसिक+डीए के 10% तक हो सकती है ।
नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) में:
- नई व्यवस्था में सेल्फ कंट्रीब्यूशन (80CCD(1) और 80CCD(1B)) पर कोई टैक्स छूट नहीं मिलती ।
- हालांकि, एम्प्लॉयर कंट्रीब्यूशन पर सेक्शन 80CCD(2) के तहत टैक्स छूट का लाभ मिलता है। नई व्यवस्था में इसे और बढ़ावा दिया गया है। सरकार और प्राइवेट दोनों क्षेत्रों के कर्मचारियों के लिए यह सीमा बढ़ाकर बेसिक+डीए का 14% कर दी गई है । हालांकि, EPF सहित सभी पेंशन फंड्स पर कुल वार्षिक सीमा ₹7.5 लाख रह सकती है।
निकासी पर टैक्स:
- रिटायरमेंट पर एकमुश्त निकाली गई 60% राशि (प्राइवेट सेक्टर के लिए 80% में से 60%) पूरी तरह टैक्स-फ्री है ।
- जिस पैसे से एन्युइटी खरीदी जाती है, वह राशि निकालते समय टैक्स-फ्री है, लेकिन एन्युइटी से मिलने वाली ब्याज आय (पेंशन) आपकी आय में जुड़कर आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स योग्य होगी ।
एनपीएस के फायदे और नुकसान (Advantages & Disadvantages of NPS)
फायदे:
- निवेश में लचीलापन (Flexibility): MSF के आने से अब प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारी म्यूचुअल फंड्स की तरह अलग-अलग फंड मैनेजर्स और स्कीम्स में निवेश कर सकते हैं ।
- कंपाउंडिंग का फायदा (Power of Compounding): लंबी लॉक-इन अवधि के कारण पैसा लंबे समय तक बाजार में बना रहता है और कंपाउंडिंग का पूरा लाभ मिलता है ।
- कम लागत (Low Cost): म्यूचुअल फंड्स की तुलना में NPS की फीस बेहद कम है। MSF में 0.3% तक फीस की इजाजत है, जो अभी भी काफी कम है ।
- टैक्स बचत (Tax Savings): नई टैक्स व्यवस्था में एकमात्र निवेश जहां टैक्स बचत का लाभ मिलता है ।
नुकसान:
- कम लिक्विडिटी (Low Liquidity): यह एक रिटायरमेंट प्रोडक्ट है, इसलिए इमरजेंसी में पैसे निकालना आसान नहीं है। निकासी के लिए सख्त नियम हैं ।
- म्यूचुअल फंड्स से कम फ्लेक्सिबिलिटी: म्यूचुअल फंड्स की तरह इसमें हर साल रीबैलेंसिंग और एलोकेशन का पूरा नियंत्रण नहीं है। कम से कम 15 साल तक किसी फंड में लगाए गए पैसे को स्विच नहीं कर सकते ।
- अनिवार्य एन्युइटी (Mandatory Annuity): सरकारी कर्मचारियों के लिए अभी भी 40% और प्राइवेट के लिए 20% कॉर्पस से एन्युइटी खरीदना अनिवार्य है, जिसका रिटर्न बहुत कम होता है ।
- म्यूचुअल फंड्स के मुकाबले कम नियंत्रण: म्यूचुअल फंड्स की तुलना में निवेश पर नियंत्रण कम है ।
एनपीएस बनाम म्यूचुअल फंड्स (NPS vs Mutual Funds)
यह एक आम सवाल है कि NPS बेहतर है या म्यूचुअल फंड्स। दोनों के अपने फायदे हैं:
| पैरामीटर | एनपीएस (NPS) | म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) |
|---|---|---|
| उद्देश्य | रिटायरमेंट प्लानिंग पर फोकस | शॉर्ट, मीडियम या लॉन्ग टर्म किसी भी लक्ष्य के लिए |
| रिटर्न | 8-10% (मॉडरेट रिटर्न) | 10-15% (ज्यादा रिटर्न की संभावना) |
| लिक्विडिटी | बहुत कम, निकासी पर पाबंदी | ज्यादा, ELSS को छोड़कर कभी भी निकाल सकते हैं |
| टैक्स बेनिफिट | नई व्यवस्था में सिर्फ एम्प्लॉयर कंट्रीब्यूशन पर; पुरानी में ₹2 लाख तक | ELSS में ₹1.5 लाख की छूट |
| लागत | बेहद कम (0.1% – 0.3%) | ज्यादा (0.5% – 2.5%) |
| नियंत्रण | सीमित, सरकारी नियमन के तहत | पूरा नियंत्रण, फंड बदल सकते हैं |
निष्कर्ष: अगर आप सिर्फ रिटायरमेंट के लिए निवेश करना चाहते हैं और टैक्स बचाना चाहते हैं, तो NPS एक बेहतरीन विकल्प है। लेकिन अगर आप ज्यादा रिटर्न और फ्लेक्सिबिलिटी चाहते हैं, तो म्यूचुअल फंड्स आपके पोर्टफोलियो का हिस्सा होने चाहिए। एक बैलेंस्ड अप्रोच के लिए दोनों में निवेश करना एक स्मार्ट रणनीति हो सकती है ।
निष्कर्ष (Conclusion)
NPS समय के साथ लगातार खुद को बेहतर बना रहा है। मल्टी-स्कीम फ्रेमवर्क ने प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों को ज्यादा विकल्प और फ्लेक्सिबिलिटी दी है, जिससे यह म्यूचुअल फंड्स के करीब आ गया है। नई टैक्स व्यवस्था में एम्प्लॉयर कंट्रीब्यूशन पर 14% तक की छूट इसे और आकर्षक बनाती है।
हालांकि, इसमें एन्युइटी की अनिवार्य खरीद और कम लिक्विडिटी जैसी कमियां भी हैं। इसलिए, NPS आपकी रिटायरमेंट प्लानिंग का एक अहम हिस्सा हो सकता है, खासकर टैक्स बचत वाले हिस्से के लिए। लेकिन बेहतर रिटर्न और लचीलेपन के लिए अपने समग्र निवेश में म्यूचुअल फंड्स और शेयरों को भी शामिल करना चाहिए।
क्या आपने NPS में निवेश शुरू कर दिया है या फिर भी कोई सवाल है? हमें कमेंट में जरूर बताएं!
यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है और इसे निवेश सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले कृपया अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह लें ।
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