जानिए भारत सरकार कैसे स्टार्टअप की परिभाषा बदलने जा रही है। एआई, डीप-टेक और सहकारी संस्थाओं को कैसे शामिल किया जाएगा? इस बदलाव से किन बिजनेस को मिलेगा टैक्स छूट का फायदा? जानें पूरी जानकारी और क्या है स्टार्टअप की मौजूदा परिभाषा।
स्टार्टअप की नई परिभाषा: भारत में बदल रही है इनोवेशन की दिशा

“सरकार ने स्टार्टअप की परिभाषा बदल दी है!” यह खबर आने वाले दिनों में भारत के युवा उद्यमियों, निवेशकों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए सबसे चर्चित विषय बनने वाली है। अगर आप AI में काम करते हैं, या गांव में सहकारी समिति चलाते हैं, या फिर कोई वैज्ञानिक शोध आधारित बिजनेस शुरू करना चाहते हैं, तो यह खबर सीधे आपके लिए है।
भारत सरकार स्टार्टअप इंडिया पहल के तहत ‘स्टार्टअप’ की मौजूदा परिभाषा को विस्तार देने पर विचार कर रही है। इसका मकसद स्टार्टअप इकोसिस्टम को सिर्फ मोबाइल ऐप्स और वेबसाइट्स से आगे ले जाकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डीप-टेक और सहकारी संस्थाओं (Cooperatives) तक पहुंचाना है। यह बदलाव न सिर्फ लाखों नए व्यवसायों के लिए दरवाजे खोलेगा, बल्कि टैक्स छूट और सरकारी योजनाओं के फायदे भी बढ़ाएगा।
पहले समझिए: भारत में स्टार्टअप किसे कहते हैं?
सरकारी भाषा में, DPIIT (उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग) द्वारा मान्यता प्राप्त एक इकाई को स्टार्टअप कहा जाता है, यदि वह निम्नलिखित शर्तें पूरी करती है:
1. संगठन का प्रकार: यह एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, पार्टनरशिप फर्म या लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (LLP) हो।
2. आयु सीमा: इसकी स्थापना/पंजीकरण की तारीख से 10 वर्ष से अधिक न हुए हों।
3. टर्नओवर सीमा: किसी भी वित्तीय वर्ष में इसका टर्नओवर 100 करोड़ रुपये से अधिक न रहा हो।
4. मुख्य उद्देश्य: इसका काम नवाचार (Innovation), विकास या सुधार पर आधारित होना चाहिए। यह केवल मौजूदा उत्पादों/सेवाओं की नकल या खरीद-फरोख्त नहीं कर रहा हो।
मौजूदा समस्या:यह परिभाषा अक्सर पारंपरिक सहकारी संस्थाओं या लंबी अनुसंधान अवधि वाले डीप-टेक व्यवसायों को पूरी तरह कवर नहीं कर पाती थी, जिससे उन्हें सरकारी लाभ नहीं मिल पाते थे।
क्या बदलाव आने वाला है? 3 बड़े समूह होंगे शामिल
सरकार का फोकस अब इकोसिस्टम को ‘ऐप-सेंट्रिक’ से ‘इनोवेशन-सेंट्रिक’ बनाने पर है। नई परिभाषा में इन तीन बड़े समूहों को शामिल करने की तैयारी है:
1. AI और डीप-टेक स्टार्टअप्स: भविष्य की तकनीक
* क्या है डीप-टेक? ये ऐसी कंपनियां हैं जो वैज्ञानिक शोध या इंजीनियरिंग ब्रेकथ्रू पर आधारित गहन तकनीकी समाधान बनाती हैं। इनमें निवेश ज्यादा, जोखिम ज्यादा और रिटर्न भी ज्यादा होता है।
* उदाहरण: क्वांटम कंप्यूटिंग, एडवांस बायोटेक, रोबोटिक सर्जरी, नई ऊर्जा भंडारण तकनीक, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी।
* फायदा: इन्हें मान्यता मिलने से सरकारी अनुसंधान ग्रांट, टैक्स हॉलिडे (धारा 80-IAC) और रिस्क कैपिटल आकर्षित करने में आसानी होगी।
2. सहकारी समितियां: ग्रामीण भारत की ताकत
* बदलाव क्या? अभी तक स्टार्टअप दर्जा ज्यादातर प्राइवेट कंपनियों को मिलता था। नई परिभाषा में सहकारी संस्थाओं के मॉडल को भी शामिल किया जा सकता है।
* उदाहरण: तकनीक का इस्तेमाल करने वाली डेयरी सहकारी समितियां, डिजिटल मार्केटप्लेस चलाने वाले किसान उत्पादक संगठन (FPO), कारीगर समूह।
* फायदा: इससे ग्रामीण उद्यमशीलता को बढ़ावा मिलेगा और टेक्नोलॉजी का लाभ देश के कोने-कोने तक पहुंचेगा।
3. मौजूदा स्टार्टअप्स के लिए ‘पिवट’ का विकल्प
* क्या है पिवट? जब कोई स्टार्टअप अपने मूल बिजनेस मॉडल या उत्पाद को बदलकर नई दिशा में जाता है, उसे ‘पिवट’ करना कहते हैं।
* फायदा:नए प्रस्ताव से, पारंपरिक ऐप-आधारित स्टार्टअप्स के लिए डीप-टेक या AI की ओर पिवट करना आसान हो जाएगा, बिना स्टार्टअप की टैक्स छूट और अन्य लाभ खोए।
इस बदलाव से क्या-क्या फायदे होंगे?
1. टैक्स में बचत: DPIIT मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स को 3 वर्षों के लिए 100% लाभ पर टैक्स छूट मिलती है। नए दायरे में आने वाले बिजनेस भी इसका लाभ उठा सकेंगे।
2. फंडिंग आसान: स्टार्टअप इंडिया फंड, विभिन्न मंत्रालयों की सब्सिडी और वेंचर कैपिटलिस्ट का पैसा इन नए क्षेत्रों की ओर बढ़ेगा।
3. रोजगार सृजन: AI और डीप-टेक से उच्च कौशल वाली नौकरियां पैदा होंगी, जबकि सहकारी क्षेत्र से सामूहिक रोजगार और ग्रामीण समृद्धि बढ़ेगी।
4. वैश्विक प्रतिस्पर्धा: भारत तकनीकी नवाचार की वैश्विक दौड़ में अमेरिका और चीन के साथ बेहतर प्रतिस्पर्धा कर सकेगा।
निष्कर्ष: भारत बनेगा ‘ग्लोबल इनोवेशन हब’
स्टार्टअप की परिभाषा का यह विस्तार केवल कागजी बदलाव नहीं है। यह भारत की आर्थिक रणनीति में एक बुनियादी बदलाव है, जो यह संकेत देता है कि देश अब मूल्य सृजन (Value Creation) और मौलिक अनुसंधान (Fundamental Research) को प्राथमिकता देगा।
यह उन सभी नवप्रवर्तकों के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है जो देश की गहरी चुनौतियों का समाधान ढूंढना चाहते हैं। अब समय आ गया है कि भारत ‘सर्विस प्रोवाइडर’ से आगे बढ़कर ‘टेक्नोलॉजी क्रिएटर’बने।
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