इस ब्लॉग में जानिए क्यों भारत का मध्यम वर्ग टैक्स देने के बावजूद गुस्से में है। नोएडा की घटना, इंदौर का जहरीला पानी, ट्रेन में चाकूबाजी – क्या इन सबके बाद भी टैक्सदाता की कोई सुनी जाएगी? हमने गहराई से विश्लेषण किया है कि टैक्स का पैसा कहाँ जा रहा है, क्यों सिर्फ 2% लोगों पर टैक्स का बोझ है, और कैसे 5 व्यावहारिक समाधानों से देश बदल सकता है। साथ ही, जानिए बजट से पहले सरकार से क्या सवाल पूछने चाहिए।

टैक्स देने के बाद भी न्याय क्यों नहीं? भारत के मध्यम वर्ग का गहरा गुस्सा
आज भारत का मध्यम वर्ग सड़कों पर नहीं, लेकिन अपने दिलों में आग लिए बैठा है। यह आग नोएडा के उस नाले से धधकी है, जहाँ एक युवती दो घंटे तक चीखती रही और व्यवस्था उसे बचाने के बजाय तमाशबीन बनी रही। यह आग इंदौर के उस जहरीले पानी से भड़की है, जिसने 25 मासूम जिंदगियाँ निगल लीं। यह आग उस ट्रेन से उठी है, जहाँ एक युवती को चाकू मारा गया और पुलिस उसे अस्पताल पहुँचाने के बजाय कागजी कार्रवाई में व्यस्त रही।
ये कोई अलग-अलर घटनाएँ नहीं हैं। ये एक सिस्टम के टूटने के लक्षण हैं। एक ऐसा सिस्टम, जहाँ टैक्सदाता सालाना लाखों रुपये का योगदान देता है, लेकिन जब उसे जरूरत पड़ती है, तो सिस्टम उसके सामने बेबस नजर आता है। सवाल यह है: अगर टैक्स देने के बाद भी हमें साफ हवा, पीने का साफ पानी, सुरक्षित सड़कें, और त्वरित न्याय नहीं मिलेगा, तो हम टैक्स क्यों दें?
– 17 पैसे कॉर्पोरेट टैक्स से।
– 18 पैसे जीएसटी से।
– 4 पैसे कस्टम ड्यूटी से।
– 5 पैसे एक्साइज ड्यूटी से।
इतना सब कुछ होने के बाद भी, सरकार अपने खर्चे पूरे नहीं कर पाती, इसलिए उसे 24 पैसे उधार लेने पड़ते हैं। यानी, देश की कुल आय का एक बड़ा हिस्सा कर्ज़ चुकाने में चला जाता है। अब सोचिए, जब पैसे की कमी है, तो प्राथमिकताएँ क्या होनी चाहिए? क्या पुल बनाने से पहले उनकी गुणवत्ता की जाँच नहीं होनी चाहिए? क्या पानी की आपूर्ति से पहले उसकी शुद्धता की जाँच नहीं होनी चाहिए?
5 व्यावहारिक समाधान: देश बदल सकता है
1. जिसका काम, उसका दाम: राज्यों के बीच संतुलन
भारत में टैक्स का वितरण असंतुलित है। महाराष्ट्र जैसा राज्य केंद्र को 1 रुपया टैक्स देता है, तो वापस सिर्फ 8 पैसे पाता है। वहीं, बिहार जैसा राज्य 1 रुपया देकर 7-8 रुपया वापस पाता है। यह व्यवस्था गरीब राज्यों के विकास के लिए जरूरी है, लेकिन समस्या तब होती है जब यह पैसा गलत हाथों में जाता है। बिहार में बार-बार पुल गिरना, केरल का दिवालियापन, पंजाब का 2 लाख करोड़ का कर्ज़ – ये सब खराब वित्तीय योजना के उदाहरण हैं। क्या दूसरे राज्यों को इनकी जिम्मेदारी उठानी चाहिए? जवाब है: नहीं। जो राज्य पैसे का सही इस्तेमाल नहीं कर सकते, उन्हें अनुदान कम मिलने चाहिए। टैक्सदाता की मेहनत की कमाई को बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।
2. कस्टम ड्यूटी सुधार: ग्रे मार्केट पर रोक
हम गरीब किसान की आय पर टैक्स नहीं, बल्कि उन करोड़पतियों की आय पर टैक्स की बात कर रहे हैं, जो खेतों की बजाय पाँच-सितारा होटलों में रहते हैं। एक समझदार सीमा (जैसे 20-30 लाख रुपये सालाना) तक कृषि आय टैक्स-मुक्त रखी जा सकती है, लेकिन उससे ऊपर की आय पर टैक्स लगना चाहिए।
3. टैक्स बेस बढ़ाएं: कैश इकोनॉमी पर लगाम
भारत में कैश इकोनॉमी एक बड़ी समस्या है। कई लोग कैश में कारोबार करके करोड़ों कमाते हैं, लेकिन टैक्स नहीं देते। उदाहरण के लिए, एक वड़ा पाव विक्रेता या बिंदी बेचने वाला व्यक्ति कैश में इतना कमा सकता है कि वह एक साथ चार फ्लैट खरीद ले। ये लोग टैक्स के दायरे से बाहर रहते हैं, और उनका बोझ ईमानदार टैक्सदाताओं पर पड़ता है। जब इनकम टैक्स विभाग ऐसे लोगों पर कार्रवाई करता है, तो वे कैश-ओनली मोड में चले जाते हैं। समाधान यह है कि बड़ी खरीददारी (कार, प्रॉपर्टी, विदेश यात्रा) के डेटा को टैक्स रिटर्न से जोड़ा जाए। जो लोग अपनी आय से ज्यादा खर्च कर रहे हैं, उन पर स्वचालित नज़र रखी जानी चाहिए।
4. जवाबदेही: टैक्सदाता है असली अल्पसंगत
भारत में एकमात्र अल्पसंगत टैक्सदाता है, जो शांति से टैक्स देता है, सड़कें नहीं जाम करता, बसें नहीं जलाता, और न ही दूध नालियों में बहाता है। इसीलिए उसकी सुनी नहीं जाती। टैक्सदाता चाहता है कि:
– हर पुलिस स्टेशन पर लिखा हो: “मेरी सैलरी टैक्सदाता के पैसे से आती है।”
– हर आईएएस अधिकारी की कार में हर दिन एक संदेश बजे: “यह मेरे बाप की कार नहीं, मैं टैक्सदाता का नौकर हूँ।”
– हर नेता और अधिकारी ट्रैफिक नियम तोड़ने पर आम आदमी से दस गुना ज्यादा जुर्माना भरे।
पिछले साल इनकम टैक्स में ऐतिहासिक बदलाव आया। अब 12 लाख रुपये तक की आय पर कोई टैक्स नहीं है। देश की प्रति व्यक्ति आय लगभग 2.4 लाख रुपये सालाना है, लेकिन 12 लाख तक टैक्स मुक्ति का मतलब है कि देश स्वर्ग बनना चाहिए। फिर भी, आम आदमी के चेहरे पर नाराजगी क्यों है? आखिर क्या वजह है कि हर साल 2 लाख से ज्यादा भारतीय देश छोड़कर जा रहे हैं?
केवल 2% लोग टैक्स देते हैं: क्या यह न्यायसंगत है?
भारत में एक बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ सिर्फ 1-2% आबादी ही इनकम टैक्स देती है। यह आंकड़ा दुनिया की किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था में सबसे कम है। अमेरिका में 33% लोग इनकम टैक्स देते हैं, जर्मनी में 51%, और जापान में 30%। लेकिन भारत में, पूरे देश का वित्तीय बोझ सिर्फ 2% लोगों के कंधों पर है।
जब यह बात कही जाती है, तो कई लोग तुरंत कहते हैं: “सब लोग टैक्स देते हैं – जीएसटी, पेट्रोल टैक्स, इंडायरेक्ट टैक्स!” यह सच है, लेकिन क्या यह व्यवस्था न्यायसंगत है? एक इनकम टैक्सदाता दोहरा टैक्स देता है – पहला अपनी आय पर, दूसरा अपनी खपत पर। वही टैक्सदाता सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को नहीं पढ़ाता, क्योंकि वहाँ शिक्षा का स्तर ठीक नहीं है। वह सरकारी अस्पतालों में इलाज नहीं कराता, क्योंकि वहाँ स्वास्थ्य सुविधाएँ अपर्याप्त हैं। उसे चुनाव के समय वोट के बदले पैसे नहीं मिलते, न ही चुनाव के बाद नौकरी। और जब वह साफ हवा की मांग करता है, तो उसे कहा जाता है कि “एयर क्वालिटी इंडेक्स तापमान की तरह होता है, घबराने की जरूरत नहीं।”
टैक्स के पैसे कहाँ जा रहे हैं? एक रुपये का विश्लेषण
मान लीजिए, देश की कुल आय सिर्फ 1 रुपया है। इस 1 रुपये में से:
– 22 पैसे इनकम टैक्स से आते हैं।
– 17 पैसे कॉर्पोरेट टैक्स से।
– आईफोन 15: अमेरिका में 1.05 लाख रुपये, भारत में 1.5 लाख रुपये (44,000 रुपये टैक्स)।
– मैकबुक: अमेरिका में 1.72 लाख, भारत में 2 लाख (15% महंगा)।
– प्लेस्टेशन 5: अमेरिका में 37,000, भारत में 50,000।
इस महंगाई की वजह है भारत की ऊँची कस्टम ड्यूटी, जो 0% से 100% तक होती है। नतीजा? लोग ग्रे मार्केट से सामान खरीदते हैं या विदेश से मँगवाते हैं, और सरकार को टैक्स नहीं मिलता। अगर कस्टम ड्यूटी को कम करके इसे एक “गोल्डीलॉक्स जोन” में लाया जाए (न ज्यादा कम, न ज्यादा ज्यादा), तो लोग भारत में ही खरीदारी करेंगे, रिटेलर्स को फायदा होगा, और सरकार को टैक्स मिलेगा।
5. कृषि आय पर टैक्स: गरीब किसान बचे, करोड़पति “किसान” नहीं
भारत में कृषि आय पूरी तरह टैक्स-मुक्त है। यह नियम गरीब किसानों को राहत देने के लिए बना था, लेकिन आज इसका गलत फायदा करोड़पति उठा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि 2007-08 से 2015-16 के बीच, 2,746 लोगों ने 1 करोड़ रुपये से ज्यादा की कृषि आय दिखाई, जो पूरी तरह टैक्स-फ्री थी। ये लोग गाँव के नहीं, बल्कि शहरों के रहने वाले हैं:
– बेंगलुरु: 321 करोड़पति “किसान”।
– दिल्ली: 275 करोड़पति “किसान”।
– मुंबई: 212 करोड़पति “किसान”।
हम गरीब किसान की आय पर टैक्स नहीं, बल्कि उन करोड़पतियों की आय पर टैक्स की बात कर रहे हैं, जो खेतों की बजाय पाँच-सितारा होटलों में रहते हैं। एक समझदार सीमा (जैसे 20-30 लाख रुपये सालाना) तक कृषि आय टैक्स-मुक्त रखी जा सकती है, लेकिन उससे ऊपर की आय पर टैक्स लगना चाहिए।
आगामी बजट में सरकार से ये सवाल पूछे जाने चाहिए:
1. टैक्स के पैसे का इस्तेमाल किस प्राथमिकता के आधार पर किया जा रहा है?
2. क्या टैक्सदाता को बेहतर सुविधाएँ देने के लिए कोई ठोस योजना है?
3. कर्ज़ बढ़ने की स्थिति में, क्या टैक्स बढ़ाए जाएंगे?
4. कैश इकोनॉमी पर रोक लगाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
5. क्या सरकारी अधिकारियों और नेताओं की जवाबदेही तय की जाएगी?
निष्कर्ष
कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता, उसे समस्याओं का समाधान करके बेहतर बनाया जाता है। भारत का मध्यम वर्ग देश की रीढ़ है, और उसकी आवाज़ सुनी जानी चाहिए। अगर आप भी मानते हैं कि टैक्सदाता को उसके पैसे का हिसाब मिलना चाहिए, तो इस ब्लॉग को शेयर करें। अपने व्हाट्सऐप ग्रुप्स में भेजें, और सरकार से सवाल पूछने के लिए तैयार रहें।
क्योंकि बदलाव तब आएगा, जब हम सिर्फ शिकायत करने की बजाय समाधान की दिशा में कदम बढ़ाएंगे।
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